B.com 3rd Semester Company Law Chapter 1 Notes

 CHAPTER 1

MEANING AND NATURE OF COMPANIES 

शीर्षक (Title) [धारा 1(1)] इसे कम्पनी अधिनियम 2013 कहा जा सकता है।

सीमा क्षेत्र (Extent) [धारा 1(2)] सारे भारत में लागू ।

आरम्भ होने की तिथि (Date of Commencement ) [ धारा 1 (3) ] यह धारा तुरन्त लागू हो जायेगी और अधिनियम के शेष प्रावधान केंन्द्र सरकार द्वारा अधिसूचना जारी कर अधिसूचना की तिथि से लागू किये जा सकेंगे। केन्द्र सरकार विभिन्न प्रावधानों को अलग-अलग तिथि से लागू कर सकती है।कम्पनी अधिनियम के प्रावधान निम्नलिखित पर लागू होंगे - [ धारा 1 (4) ]

 (a) इस अधिनियम के अन्तर्गत या पिछले किसी कम्पनी कानून के अन्तर्गत निगमित कम्पनियों पर। 

(b) बीमा कम्पनियों पर सिवाय उन प्रावधानों के जो बीमा अधिनियम, 1938 या बीमा नियामक और विकास अधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रावधानों के विरुद्ध नहीं हैं।

(c) बैंकिंग कम्पनियाँ सिवाय उन प्रावधानों के जो बैंकिंग नियमन अधिनियम, 1949 के प्रावधानों के विरुद्ध नहीं है

(d) कम्पनियाँ जो विद्युत् उत्पादन और वितरण का कार्य कर रही हैं, सिवाय उन प्रावधानों के जो विद्युत् अधिनियम, 2003 के प्रावधानों के विरुद्ध नहीं हैं।

(c) अन्य कोई कम्पनी जो विशेष अधिनियम द्वारा शासित होती है, सिवाय उन प्रावधानों के जो उन विशेष अधिनियमों के प्रावधानों के विरुद्ध नहीं हैं।

(f) ऐसे निगमित निकाय जो तथासमय लागू अधिनियम से निगमित हो, सिवाय उन अपवादों,


संशोधनों या रूपान्तरों (Adaptation) के जो अधिसूचना में निर्दिष्ट हो ।


अर्थ (Meaning)—कम्पनी शब्द अँग्रेजी भाषा का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है व्यक्तियों का साथ या समूह। वास्तव में देखा जाये तो एक कम्पनी व्यक्तियों का एक समूह है जो किसी सामान्य उद्देश्य, कार्य या व्यवसाय को करने के लिए एकत्र हुआ है। किन्तु कम्पनी कानून के अनुसार कम्पनी शब्द का अर्थ ऐसी कम्पनी (व्यक्तियों के समूह ) से है जो कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत पंजीकृत हो (A Company registered under the Companies Act) या संसद अथवा विधान मण्डल द्वारा पारित अधिनियम के अन्तर्गत बनाई गई हो।


कम्पनी के पंजीकृत हो जाने पर इसका, इसके सदस्यों से पृथक् कानूनी अस्तित्व हो जाता है और कानून इसे वैधानिक या कृत्रिम व्यक्ति के रूप में मान्यता प्रदान करता है। इसके कुछ अधिकार व कुछ दायित्व होते हैं।

कम्पनी की परिभाषाएँ (Definitions of a Company)—मुख्य विद्वानों तथा न्यायाधीशों ने कम्पनी की विभिन्न परिभाषाएँ दी हैं, उनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं लार्ड न्यायाधीश लिन्डले ने कम्पनी की परिभाषा इस प्रकार दी है-“कम्पनी व्यक्तियों का एक समूह है जो मुद्रा या मुद्रा के बराबर का अंशदान एक संयुक्त कोष में करते हैं और जिसका प्रयोग वे एक सामान्य उद्देश्य के लिए करते हैं।" यह परिभाषा अपर्याप्त है। यह कम्पनी की अन्य विशेषताओं को जैसे-सीमित दायित्व, अंशों की हस्तान्तरणीयता और वैधानिक अस्तित्व आदि का उल्लेख नहीं करती।


प्रमुख न्यायाधीश मार्शल ने एक बहुत व्यापक व पूर्ण परिभाषा दी है जो निम्न प्रकार है "संयुक्त पूँजी कम्पनी एक कृत्रिम, अदृश्य तथा अमूर्त संस्था है, जिसका वैधानिक अस्तित्व होता है और जो विधान द्वारा निर्मित होती है। कानून की उत्पत्ति होने के कारण इसके पास वही सम्पत्ति होती है जो इसे जन्म देने वाला कानून (Charter) इसे स्पष्ट रूप से प्रदान करता है या जो इसके अस्तित्व केलिए आवश्यक है। "2न्यायाधीश लिन्डले की तुलना में यह परिभाषा अधिक पूर्ण लगती है। यह कम्पनी की विशेषताओं को ठीक प्रकार से उजागर करती है। प्रोफेसर हैने ने भी कम्पनी की एक व्यापक व पूर्ण परिभाषा दी है


"कम्पनी विधान द्वारा निर्मित एक कृत्रिम व्यक्ति है, जिसका उसके सदस्यों से पृथक् एवं स्थायी अस्तित्व होता है, जिसके पास सार्व मुद्रा होती है।" प्रोफेसर हैने द्वारा दी गई परिभाषा स्पष्ट रूप सेबताती है कि एक कम्पनी क्या है, इसकी प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? कम्पनी अधिनियम 2013 द्वारा दी गई परिभाषा (Definition as per the Companies Act, 2013)

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2, उप-धारा (20) के अनुसार एक कम्पनी की परिभाषा इस प्रकार है-"कम्पनी का अर्थ एक कम्पनी से है जो इस अधिनियम या किसी पिछले कम्पनी कानून के अन्तर्गत निगमित है।" एक सीमित कम्पनी निम्न प्रकार की हो सकती है


(i) गारण्टी द्वारा सीमित व (ii) अंशों द्वारा सीमित ।*


निष्कर्ष (Conclusion)—उपरोक्त परिभाषाओं का विश्लेषण करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि "कम्पनी विधान द्वारा निर्मित एक कृत्रिम व्यक्ति है जिसका समामेलन इस अधिनियम या पिछले कम्पनी कानून के अन्तर्गत हुआ है। उसका सदस्यों से पृथक् स्थायी अस्तित्व होता है, उसके सदस्यों का दायित्व सीमित होता है और जिसकी सार्वमुद्रा होती है। "


कम्पनी की विशेषताएँ

(CHARACTERISTICS OF A COMPANY)

कम्पनी की उपर्युक्त दी गई परिभाषाओं के विश्लेषण से एक कम्पनी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. ऐच्छिक एवं निगमित संस्था (Voluntary and Incorporated Association)— कम्पनीकी महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि कम्पनी एक ऐच्छिक संस्था है जो सदस्य अपनी स्वतन्त्र इच्छा सेनाते हैं। यह कानून द्वारा निगमित संस्था है। इसका समामेलन अधिनियम के अन्तर्गत होता है। बगैरस मामेलन के कम्पनी का कोई अस्तित्व नहीं है और कानूनी रूप से उसे कम्पनी नहीं कह सकते हैं।

2. कृत्रिम कानूनी व्यक्ति (Artificial Legal Person) कम्पनी का पंजीकरण हो जाने के याद कम्पनी एक कृत्रिम कानूनी व्यक्ति बन जाती है। यह अपने नाम से सम्पत्ति खरीद सकती है, उसे अपने नाम से रख सकती है और आवश्यकता पड़ने पर उसे बेच सकती है। यह अपने नाम से न्यायालय में मुकदमा कर सकती है, अन्य व्यक्ति इसके नाम से इस पर मुकदमा कर सकते हैं। इसका भौतिक अस्तित्व (Physical Existence) नहीं होता। इसलिए गुस्से में आप इस पर आक्रमण करके इसे गिरा नहीं सकते। इसकी कोई आत्मा नहीं है, न ही कोई अन्त:करण (Conscience) है, इसलिए इसे कृत्रिम व्यक्ति (Artificial Person) कहा जाता है। किन्तु फिर भी कानून इसे प्राकृतिक व्यक्ति की तरह कुछ अधिकार व दायित्व प्रदान करता है। यह सम्पत्ति खरीद व बेच सकती है। कम्पनी अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर इस पर जुर्माना किया जा सकता है।


3. पृथक् अस्तित्व (Separate Entity) – कम्पनी का पंजीकरण हो जाने के पश्चात् इसका पृथक् अस्तित्व हो जाता है। कम्पनी और कम्पनी के सदस्यों का अस्तित्व पृथक्-पृथक् होता है। यदि - कम्पनी के एक सदस्य के पास कम्पनी के सारे अंश भी हों तो भी कानून की दृष्टि में कम्पनी इसके सदस्यों से पृथक् होती है। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन कम्पनी के प्रमुख विवाद सैलोमन बनाम सैलोमन एण्ड कम्पनी लिमिटेड में हुआ था।


एक चमड़े के व्यापारी सैलोमन ने अपना व्यापार 38,782 पौण्ड में एक कम्पनी को बेच दिया कम्पनी ने प्रतिफल के बदले में 20,000 पौण्ड के ऋणपत्र और 10,000 पौण्ड के एक-एक पौण्ड वाले अंश सैलोमन को जारी कर दिये। कम्पनी ने ऋणपत्रों पर सारी सम्पत्ति के विरुद्ध चल भार उत्पन्न कर दिया। सैलोमन ने एक-एक अंश अपने चार पुत्रों को, अपनी पत्नी और पुत्री को जारी कर दिए। कुछ समय पश्चात् कम्पनी को हानि हो गई और उसका समापन आरम्भ हो गया। कम्पनी की


सारी सम्पत्ति बेच कर 6,047 पौण्ड वसूल हुए। चूँकि सैलोमन, 20,000 पौण्ड के बॉण्डों का धारक था और उसके पक्ष में कम्पनी को सारी सम्पत्ति का चल भार उत्पन्न किया गया था, उसने 6,047 पौण्ड की सम्पत्ति पर अपने अधिकार का दावा किया। कम्पनी के अन्य ऋणदाताओं ने 6,047 पौण्ड की सम्पत्ति को अपने ऋणों की पूर्ति के लिए माँगा। उनका कहना था कि चूँकि कम्पनी के 20,000 हजार अंशों में से लगभग सारे अंश (20,000 - 6 अंशों को छोड़कर जो अन्य सदस्यों के पास थे) सैलोमन के पास थे, सैलोमन और सैलोमन एण्ड कम्पनी एक ही थे। अतः 6,047 पौण्ड की सम्पत्ति उनके ऋणों का भुगतान करने के लिए उन्हें दी जाए।

हाउस ऑफ लार्ड ने निर्णय दिया कि सैलोमन और सैलोमन एण्ड कम्पनीका अस्तित्व अलग-अलग है। अतः सैलोमन, ऋणपत्रधारी होने के कारण और उसके पक्ष में चल भार उत्पन्न होने के कारण 6,047 पौण्ड की सम्पत्ति पाने का अधिकारी था।इस निर्णय से यह सिद्ध हो जाता है कि कम्पनी और उसके सदस्यों का अस्तित्व पृथक् पृथक्हो ता है। कम्पनी से यदि र 10,000 वसूल करने हों तो अंशधारियों पर मुकदमा करके यह राशि वसू नहीं की जा सकती। मुकदमा कम्पनी के नाम से कम्पनी के ऊपर ही किया जा सकता है, उसके सदस्यों के विरुद्ध नहीं। इस सम्बन्ध में लॉर्ड मेघनाथन की टिप्पणी ध्यान देने योग्य है “कम्पनी, कानून की दृष्टि में, कम्पनी के सीमानियम के अभिदानकर्ताओं (Subscribers) से एकदम अलग है और यद्यपि समामेलन के बाद यह हो सकता है कि व्यापार लगभग पहले जैसा ही हो और वे ही व्यक्ति इसका लाभ प्राप्त कर रहे हों, कम्पनी कानून की दृष्टि में अभिदानकर्ताओं की एजेण्ट या ट्रस्टी नहीं है। न ही अभिदानकर्ता, सदस्यों के रूप में किसी भी प्रकार से (Shape) या रूप (Form) में उत्तरदायी है सिवाय अधिनियम द्वारा निर्दिष्ट सीमा और ढंग से।" सैलोमन के विवाद का सिद्धान्त बाद में ली बनाम ली एयर फार्मिंग लि. के मामले में लागू किया गया। ली के पास एक अंश के अतिरिक्त सारे अंश थे। उसने अपने पक्ष में मत (Votes) डालकर अपने आपको कम्पनी का प्रबन्ध संचालक नियुक्त कर लिया और अपने आपको एक वेतन पर कम्पनी का मुख्य पायलट भी नियुक्त कर लिया।

कम्पनी का कार्य करते समय हवाई दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गई। ली की विधवा ने ली एअर फार्मिंग कम्पनी के विरुद्ध पति की मौत के हर्जाने का मुकदमा कर दिया। बीमाकर्ता ने इस आधार पर दावे का विरोध किया कि ली और ली एअर फार्मिंग लि. एक ही व्यक्ति थे। निर्णय दिया गया कि ली और ली एअर फार्मिंग लि. पृथक्-पृथक् व्यक्ति थे और उसकी विधवा दावा करने की अधिकारी थी।"प्रभावी रूप से निगमित व्यक्तित्व का जादू एक ही समय में स्वामी और नौकर बन जाता है

 4. शाश्वत् उत्तराधिकार (Perpetual Succession)- कम्पनी का अस्तित्व सतत् अर्थात् शाश्वत् होता है। चूँकि कम्पनी का अस्तित्व पृथक् होता है, अपेक्षाकृत इसका अस्तित्व एकाकी व्यापारी या साझेदारी से अधिक स्थायी होता है। कम्पनी की आयु कम्पनी के सदस्यों की आयु पर निर्भर नहीं करती। किसी सदस्य या निदेशक की मृत्यु, यहाँ तक कि सभी सदस्यों की मृत्यु, दिवालियापन, पागलपन या सेवानिवृत्ति के कारण भी कम्पनी की मृत्यु नहीं हो सकती।यह कहा जाता है कि कम्पनी के सदस्य आयें या जायें, कम्पनी सदा जीवित रहती है। कम्पनी एक नदी के समान बहती (जीवित) रहती है। नदी में पानी आता है जाता है, परन्तु नदी कभी रुकतीं। नहीं है।युद्ध के दौरान एक निजी कम्पनी के सभी सदस्यों की साधारण सभा के समय एक बम्ब गिरने के कारण मृत्यु हो गई। किन्तु कम्पनी जीवित रही, एक हाइड्रोजन बम्ब भी इसे नहीं मार सका।

एक कम्पनी की तुलना राजा के साथ भी की जा सकती है राजा के बारे में कहा जाता है कि, "राजा की मृत्यु हो गई,” और “राजा लम्बे समय तक जीवित रहे," (The king is dead, long live the king) राजा आये या जाए, किन्तु राजा का पद हमेशा जारी रहेगा। इसी प्रकार से कम्पनी के सदस्य आयें या जायें, किन्तु कम्पनी हमेशा चालू रहेगी। एक कम्पनी का जन्म कानून के द्वारा होता है, इसकी मृत्यु भी कानून द्वारा होती है, इसकी प्राकृतिक मृत्यु नहीं होती।


5. सार्वमुद्रा (Common Seal) - कम्पनी की सार्वमुद्रा होती है। चूँकि कम्पनी एक कृत्रिम व्यक्ति होती है, यह स्वयं कार्य नहीं कर सकती। इसलिए इसे प्राकृतिक व्यक्तियों (निदेशकों) के माध्यम से कार्य करना होता है। कम्पनी के निदेशक कम्पनी की ओर से अनुबन्ध करते समय अपने हस्ताक्षरों के साथ कम्पनी की सार्वमुद्रा को अनुबन्ध पर लगाते हैं जो कम्पनी के हस्ताक्षरों के समान मानी जाती है।


6. सीमित दायित्व (Limited Liability )—सम्भवत: कम्पनी की सबसे अधिक महत्वपूर्ण विशेषता सीमित दायित्व है, जिसके कारण कम्पनी का निर्माण किया जाता है। अंशों द्वारा सीमित दायित्व वाली कम्पनी में प्रत्येक अंशधारी का दायित्व उसके द्वारा लिये गये अंशों के अंकित मूल्य तक सीमित है, उसे इससे अधिक की राशि के वास्ते कम्पनी के दायित्वों को पूरा करने के लिए दायी नहीं ठहराया जा सकता। उदाहरण के लिए, यदि 'अ' के पास ₹ 100 वाले 10 अंश है और उसने उन अंशों। पर ₹ 50 प्रति अंश का भुगतान कर दिया है। कम्पनी के समापन में जाने पर उसका अधिकतम दायित्व । बकाया ₹500 (10 x 50 ) होगा।


गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी की दशा में प्रत्येक सदस्य का दायित्व, कम्पनी के समापन में जाने की स्थिति में, उसके द्वारा दी गई गारण्टी के अंशदान की राशि तक सीमित है, इससे अधिक नहीं। कम्पनी के जीवनकाल में उसका दायित्व शून्य है। 

7. अंशों की हस्तान्तरणीयता (Transferability of Shares)—कम्पनी की एक प्रमुख विशेषता ।है से दूसरेव्यक्ति को हस्तान्तरित किये जा सकते हैं।

8. पृथक् सम्पत्ति (Separate Property)—यह पृथक् अस्तित्व के सिद्धान्त का एक भाग है। एक कम्पनी का अपने सदस्यों से पृथक् अस्तित्व होता है। एक कम्पनी को सम्पत्ति के पृथक् स्वामित्व का अधिकार होता है। कम्पनी की सम्पत्ति कम्पनी के सदस्यों की सम्पत्ति नहीं है, यद्यपि कम्पनी के


सदस्य कम्पनी की पूँजी में अंशदान करते हैं। कोई भी सदस्य कम्पनी के जीवनकाल में और समापन पर कम्पनी की सम्पत्ति पर स्वामित्व का दावा नहीं कर सकता। [पेरूमल बनाम जॉन डिविन'] अंशधारियों का कम्पनी की सम्पत्ति में बीमा-योग्य हित (Insurable Interest) भी नहीं होता [मैकोरा बनाम नारर्थन एशुरेन्स कम्पनी लि.] मैकोरा के पास एक टिम्बर कम्पनी के एक अंश के सिवाय सारे अंश थे। उसने कम्पनी के टिम्बर का बीमा अपने नाम से कराया। सारा टिम्बर आग से नष्ट हो गया। निर्णय दिया गया कि मैकोरा हानि के लिए दावा नहीं कर सकता क्योंकि उसका कम्पनी के टिम्बर में बीमा योग्य हित नहीं था, यद्यपि वह लगभग सारे अंशों का धारक था। उसका कम्पनी केटिम्बर में कोई कानूनी या सम्यक् (Equitable) हित नहीं था।


9. मुकदमा करने की योग्यता (Capacity to Sue ) — एक कम्पनी का पृथक् अस्तित्व होता है। अतः यह मुकदमा कर सकती है, इस पर इसके नाम से मुकदमा चलाया जा सकता है। (COMPANY IS NOT A CITIZEN)कम्पनी एक नागरिक नहीं हैयद्यपि कम्पनी एक कानूनी व्यक्ति है जिसके पास राष्ट्रीयता और निवास स्थान (Domicile) है,तथापि यह एक नागरिक नहीं है। [स्टेट ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इण्डिया लि. बनाम सी.टी.ओ.]न्यायाधीश हिदायतउल्ला ने कहा-सदस्य जो निगमित कम्पनी का निर्माण करते हैं, वे अपने पद या व्यक्तित्व को एकत्रित नहीं करते। यदि वे सभी भारत के नागरिक हैं तो कम्पनी भारत की नागरिक नहीं बन जायेगी-उससे अधिक यदि वे सारे शादी शुदा हैं तो कम्पनी शादी शुदा नहीं बन जायेगी। परन्तु दुश्मन चरित्र (Enemy Character) का निर्धारण करते समय न्यायालय कम्पनी के सदस्यों या निदेशकों की नागरिकता पर विचार कर सकता है जैसा कि डायमलर कम्पनी लिमिटेड बनाम कॉन्टीनेन्टल टायर और रबड़ कम्पनी लिमिटेड' के मामले में निर्णय दिया गया था।


क्या एक कम्पनी को मौलिक अधिकार प्राप्त है ? (WHETEHER A COMPANY CAN CLAIM FUNDAMENTAL RIGHTS)

चूँकि कम्पनी एक नागरिक नहीं है, इसे आधारभूत अधिकार ( Fundamental Rights) भी प्राप्त नहीं है जो स्पष्ट रूप से केवल नागरिकों को उपलब्ध हैं। परन्तु यह उन अधिकारों की माँग कर सकती है जो नागरिकों- गैर-नागरिकों, सभी को उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए, व्यापार या वाणिज्य करने की स्वतन्त्रता को कम नहीं किया जा सकता।


कम्पनी का निवास स्थान या अधिवास

(DOMICILE)

यद्यपि कम्पनी एक नागरिक नहीं है, तथापि इसके पास राष्ट्रीयता, निवास स्थान और घर है। कम्पनी के समामेलन का देश इसका निवास स्थान (Domicile) है। एक कम्पनी उस स्थान पर रहती है जहाँ से इसके व्यवसाय का केन्द्रीय नियन्त्रण और प्रबन्ध चलाया जाता है [स्वीडिश रेल कम्पनी लिमिटेड बनाम थॉम्पसन ]


समामेलन आवरण (पर्दे) को उठाना

(LIFTING OR PIERCING THE VEIL OF INCORPORATION)

एक कम्पनी का अपने सदस्यों से अलग अस्तित्व है। अतः कम्पनी के कार्यों के लिए कम्पनी के सदस्यों को दायी नहीं ठहराया जा सकता। इस तरह, कम्पनी और इसके सदस्यों के बीच एक आवरण या पर्दा (Veil) है। साधारणतः न्यायालय या कम्पनी प्राधिकरण (Tribunal) पर्दे के पीछे नहीं देखेगा अर्थात् यह नहीं जाँच करेगा कि कम्पनी का नियन्त्रण वास्तव में किन व्यक्तियों के पास है? 

परन्तु पृथक अस्तित्व की अवधारणा का कम्पनी के सदस्यों या निदेशकों को करों की चोरी करने लोगों को धोखा देने, अवैधानिक या अनुचित कार्य के लिए दुरुपयोग की आज्ञा नहीं दी जा सकती। ऐस दशा में न्यायालय या कम्पनी प्राधिकरण कम्पनी के आवरण को हटाकर यह जाँच कर सकता है कि वास्तव में दोषी व्यक्ति कौन हैं और उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही कर सकता है। “इसे ही कम्पनी का आवरण या पर्दा उठाना कहते हैं।"

कब कम्पनी का आवरण (पर्दा) उठाया जा सकता है? परिस्थितियाँ जिनमें कम्पनी के आवरण को हटाया जा सकता है, मोटे तौर पर दो भागों में बाँटी जा

सकती हैं

(I) न्यायिक निर्णयों के अन्तर्गत, और (II) स्पष्ट वैधानिक प्रावधानों के अन्तर्गत ।

(I) न्यायिक निर्णयों के अन्तर्गत (Under Judicial Judgement) - निम्नलिखित दशाओं में कम्पनी के आवरण को हटाया जा सकता है

1. सरकारी राजस्व (करों) की चोरी रोकने के लिए (Protection of Revenue ) — न्यायालयों ने कम्पनी आवरण को करों की चोरी रोकने के लिए हटाया है [सर दिनशा मानेक जी पेटिट का विवाद, AIR (1927) बम्बई, 371]। इस विवाद में करदाता ब्याज और लाभांश की अपनी आय पर अपने अधि-कर के दायित्व को अत्याधिक कम करना चाहता था। उसने चार निजी कम्पनियाँ बनाई और अपने निवेश उन चारों निजी कम्पनियों को हस्तान्तरित कर दिये। इन कम्पनियों ने ब्याज और लाभांश प्राप्त किया। करदाता इन कम्पनियों से ऋण लेता रहता था और कभी ऋण वापस नहीं करता था। इस प्रकार से इस करदाता की आय चार कम्पनियों में बँट गई और उसका कर दायित्व अत्याधिक कम हो गया। निर्णय दिया गया कि करदाता ने कम्पनियों का निर्माण केवल करों से बचने के लिए किया था और कम्पनियाँ करदाता से पृथक (अलग) नहीं थीं। कम्पनियाँ कोई व्यापार नहीं कर रही थीं परन्तु केवल कानूनी संस्था के रूप में स्थापित की गई थीं ब्याज और लाभांश प्राप्त करके कल्पित ऋण (Pretended Loan) के रूप में करदाता को देने के लिए, जो कभी वापस नहीं लौटाये जाते थे।

शान्तनुराय बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया, (1988) 38 ELT (Del.) इस मामले में डंकन एग्रो इण्डस्ट्रीज लिमिटेड के व्यक्तिगत निदेशकों को केन्द्रीय उत्पाद शुल्क (Excise Duty) अधिकारियों ने कपट के द्वारा उत्पाद शुल्क (Excise Duty) की कथित चोरी के कारण, कारण बताओ सूचना जारी की। निदेशकों द्वारा इसे इस आधार पर चुनौती दी गई कि यह कर दायित्व कम्पनी का था, उनका नहीं । उच्च न्यायालय ने कर के दायित्व का निर्धारण करने के लिए कम्पनी के आवरण को हटाया। न्यायालय ने टिप्पणी की कि कोई निदेशक जो कपट का दोषी है या अपकृत्य (Tort) करता है, वह व्यक्तिगत रूप से दायी होगा।

2. कपट या अनुचित व्यवहार को रोकने के लिए (Prevention of Fraud or Improper Conduct)—
यदि कम्पनी के पृथक् अस्तित्व का दुरुपयोग लोगों को धोखा देने या वैधानिक दायित्व से बचने के लिए किया जाता है तो न्यायालय या कम्पनी प्राधिकरण कम्पनी के आवरण को हटाकर दोषी व्यक्तियों को दण्डित कर सकता है।

गिलफोर्ड मोटर कम्पनी बनाम होंने (1913) 1 Ch. 935 होने को गिलफोर्ड मोटर कम्पनी का प्रबन्ध निदेशक नियुक्त किया गया। सेवा अनुबन्ध में यह शर्त लगा दी गई थी कि वह कम्पनी के ग्राहकों को नहीं पटायेगा (Solicit) अर्थात् अपनी ओर आकर्षित नहीं करेगा। होंने ने एक कम्पनी बनाई जिसने गिलफोर्ड मोटर कम्पनी के ग्राहक को पटाना आरम्भ कर दिया। निर्णय दिया गया कि कम्पनी एक पर्दा या धोखा थी होने को सेवा अनुबन्ध का उल्लंघन करके उसके ग्राहकों को पटाने के लिए। न्यायालय ने कम्पनी के आवरण को हटाकर होने और उसकी कम्पनी को गिलफोर्ड मोटर कम्पनी के ग्राहकों को पटाने से रोक दिया।

जॉन बनाम लिपमैन (1962) AID. E342 इस मामले में लिपमैन, जॉन को अपनी जमीन बेचने

के लिए सहमत हो गया। बाद में उसने अपना निर्णय बदल लिया। अनुबन्ध के विशिष्ट निष्पादन (Specific Performance) को रोकने के लिए लिपमैन ने इसी उद्देश्य से एक कम्पनी बनाई और उसे जमीन हस्तान्तरित कर (बेच दी। कम्पनी में केवल लिपमैन और उसने वकील का लिपिक सदस्य थे। जॉन ने लिपमैन के विरुद्ध विशिष्ट निष्पादन के लिए मुकदमा कर दिया। न्यायालय ने परिस्थितियाँ की वास्तविकता के कारण अर्थात् लिपमैन कम्पनी के आवरण का दुरुपयोग अपने दायित्व से बचने के लिए कर रहा था, न्यायालय ने हस्तान्तरण को अस्वीकार करते हुए लिपमैन और उसकी कम्पनी के विरुद्ध विशिष्ट निष्पादन के आदेश दे दिए।

3. कम्पनी के शत्रु चरित्र का निर्धारण करने के लिए (To Detern ine Enemy Character of the Company)—
जब कम्पनी का प्रबन्ध उन व्यक्तियों के हाथ में हो जो शत्रु देश (Enemy Country) में रह रहे हों तो न्यायालय या कम्पनी प्राधिकरण कम्पनी के आवरण को हटा सकता है क्योंकि कम्पनी का शत्रु चरित्र है। ऐसे मामलों में शत्रुओं को समामेलन के आवरण की आड़ में व्यवसाय करने देना सार्वजनिक नीति ( Public Policy) के विरुद्ध होगा

डायमलर कम्पनी लिमिटेड बनाम कॉल्टीनेन्टल टायर और रबड़ कम्पनी लिमिटेड (1916) 24 307 इस मामले में एक कम्पनी का निर्माण इंग्लैण्ड में जर्मन कम्पनी द्वारा निर्मित टायर बेचने के लिए किया गया। जर्मन कम्पनी के पास इंग्लिश कम्पनी के अंशों का बहुमत था और इसके सभी निदेशक जर्मन थे। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इंग्लिश कम्पनी ने एक ऋणी के विरुद्ध व्यावसायिक ऋण की वसूली के लिए दावा कर दिया। ऋणी ने न्यायालय से प्रार्थना की कि कम्पनी को ऋण वसूल करने से रोका जाए क्योंकि कम्पनी एक दुश्मन थी क्योंकि इसका नियन्त्रण जर्मन निवासियों के हाथ में था। न्यायालय ने कम्पनी को ऋण वसूल करने की आज्ञा नहीं दी। न्यायालय ने टिप्पणी की- “एक कम्पनी प्राकृतिक व्यक्ति नहीं है, मस्तिष्क या अन्तरचेतना के साथ ( With Conscience) यह निष्ठावान या गैर-निष्ठावान (Loyal or Disloyal) नहीं हो सकती न तो यह मित्र हो सकती और न ही दुश्मन। परन्तु इसका चरित्र दुश्मन हो सकता है, जब वे व्यक्ति जिनका कम्पनी पर वास्तविक नियन्त्रण है, एक दुश्मन देश में रह रहे हैं या जहाँ भी दुश्मनों के नियन्त्रण में कार्य कर रहे हैं।"

4. कल्याणकारी अधिनियमों से बचना (Avoidance of Welfare Legislations)
न्यायालय या कम्पनी प्राधिकरण कम्पनी का आवरण हटा सकता है यदि इसे लगे कि कम्पनी, आवरण का दुरुपयोग कल्याणकारी अधिनियम से बचने के लिए कर रही है। वर्कमैन ऑफ एसोसियेटेड रबड़ इण्डस्ट्री लिमिटेड (1986) 59 कम्पनी केस 134 (S.C.)] इस मामले में यह पाया गया कि नई कम्पनी

'बनाने का अकेला उद्देश्य वर्कमैन को वोनस के भुगतान के दायित्व को कम करने के लिए था । 5. न्यायालय की मानहानि का निर्धारण करने के लिए (To Determine Contempt of

Court) जहाँ कम्पनी के आवरण का दुरुपयोग न्यायालय या कम्पनी प्राधिकरण की मानहानि से बचने के लिए किया जा रहा है, वहाँ न्यायालय या कम्पनी प्राधिकरण कम्पनी के आवरण को हटा सकता है और दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही कर सकता है। ज्योति लि. कंवलजोत भसीन (1987) 62 कम्पनी केस 626 (Delhi) | इस मामले में प्रतिवादियों (Respondents) ने दो मंजिले बेचने की सहमति दी, किन्तु बाद में ऐसा करने से मना किया। प्रतिवादियों द्वारा मंजिले किसी अन्य व्यक्ति को बेचने से रोकने के लिए वादी द्वारा वाद करने पर न्यायालय ने प्रतिवादियों को मंजिले बेचने से रोक दिया। प्रतिवादियों ने केवल 2 सदस्यों के साथ एक निजी कम्पनी बनाई। उनमें से एक कम्पनी का अध्यक्ष और दूसरा प्रबन्ध निदेशक बन गया। प्रतिवादियों ने मंजिले निजी कम्पनी को हस्तान्तरित कर (बेच) दी। निजी कम्पनी ने न्यायालय द्वारा निषेध आज्ञा (Restraint Order) के बावजूद मंजिले बेच दी। प्रतिवादियों ने स्वीकार किया कि मंजिले निजी कम्पनी ने बेच दी थी न कि उन्होंने (प्रतिवादियों ने)। न्यायालय ने इस दलील को अस्वीकार कर दिया और निर्णय दिया कि इसकी निषेध आज्ञा का उल्लंघन वास्तव में प्रतिवादियों ने किया है जो इसके अध्यक्ष और प्रबन्ध निदेशक थे।

6. कम्पनी की तकनीकी सक्षमता का निर्धारण करने के लिए (Determination of Technical Competence of the Company)
- जिस प्रकार कम्पनी का दुश्मन चरित्र निर्धारण करने के लिए कम्पनी के आवरण को हटाया जा सकता है, ठीक उसी प्रकार से कम्पनी की तकनीकी सक्षमता की घोषणा करने के लिए न्यायालय या कम्पनी प्राधिकरण कम्पनी के आवरण को हटा सकता है। [न्यू हॉरीजोन्स लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया (1995)।] कम्पनी LT. 100 (S.C)) (1927) 27 CLA 56 (5C)] इस मामले में न्यू हॉरीजोन्स लिमिटेड की निविदा (Tender) टैलीकम्युनिकेशन विभाग, टेलीकॉम डिस्ट्रिक्ट हैदराबाद ने इस आधार पर रद्द कर दी कि वादी के पास आवश्यक तकनीकी क्षमता नहीं थी। वादी कम्पनी विख्यात विदेशी सहयोगकर्ता कम्पनी के साथ संयुक्त उपक्रम कम्पनी (Joint Venture Company) थी। कम्पनी की दलील थी कि बेशक भारतीय कम्पनी के पास आवश्यक तकनीकी सक्षमता नहीं थी, परन्तु उसके विदेशी सहयोगी संयुक्त उपक्रम कम्पनी के पास आवश्यक तकनीकी सक्षमता थी। उच्च न्यायालय ने याचिका रद्द कर दी। अपील दायर करने पर उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि कम्पनी की तकनीकी सक्षमता का निर्धारण करने के लिए कम्पनी के आवरण को हटाया जा सकता है। इसकी सहयोगी कम्पनी की तकनीकी सक्षमता पर भी विचार किया जायेगा। चूँकि सहयोगी कम्पनी के पास आवश्यक तकनीकी सक्षमता थी, प्रतिवादी संख्या 4 (प्रतिद्वन्द्वी फर्म - Rival Firm) की निविदा को स्वीकार करना अनुचित व अविवेक पूर्ण था। 

(II) स्पष्ट वैधानिक प्रावधानों के अन्तर्गत (Under Express Statutory Provisions) - कम्पनी अधिनियम ने भी स्पष्ट प्रावधानों की व्यवस्था की है जिनके अन्तर्गत कम्पनी का आवरण हट जाता है, उनमें से कुछ महत्वपूर्ण निम्नलिखित हैं

1. कम्पनी के नाम का गलत वर्णन करने पर (On Misdescription of Name of the Company)–यदि कम्पनी के निदेशक या अधिकारी या अन्य कोई व्यक्ति जो कोई अनुबन्ध या कार्य करता है तथा हस्ताक्षर के स्थान पर कम्पनी का नाम व पता न लिखकर मात्र स्वयं के हस्ताक्षर कर देता है, तो वह अनुबन्ध या कार्य के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होगा। उदाहरण के लिए, यदि कम्पनी का अधिकारी विपत्र पर हस्ताक्षर करता है यह उल्लेख किये बगैर कि वह कम्पनी के लिए (कम्पनी की तरफ से) हस्ताक्षर कर रहा है तो वह इस विपत्र की राशि का भुगतान व्यक्तिगत रूप से करने के लिए उत्तरदायी होगा जब तक कि उसका भुगतान पहले ही कम्पनी द्वारा न कर दिया गया हो।

2. कपट द्वारा जमा स्वीकार करने और वापस न करने पर (Accepting Deposits with Intend to Defraud and not Repaying the Deposits) [ धारा 74, 75 और 447] – यदि एक कम्पनी जमा या उसका कोई भाग या उस पर देय ब्याज का भुगतान देय तिथि को अथवा प्राधिकरण द्वारा बढ़ाई गई अवधि में वापस करने में असफल रहती है तो जुर्माने द्वारा दण्डित की जायेगी। यदि यह सिद्ध हो जाता है कि जमा कपट द्वारा स्वीकार किया गया था या कपटपूर्ण उद्देश्य के लिए किया गया था तो जुर्माना जो एक करोड़ रुपये से कम नहीं होगा और जो दस करोड़ रुपये तक हो सकता है और प्रत्येक दोषी अधिकारी सजा पाने का दोषी होगा जो 7 वर्ष तक हो सकती है या जुर्माने के साथ जो ₹25 लाख से कम नहीं होगा और जो र2 करोड़ तक हो सकता है अथवा दोनों।

इसके अतिरिक्त दोषी अधिकारी धारा 447 के प्रावधानों के पूर्वाग्रह के बगैर (Without Prejudice) और दायित्व की किसी सीमा के बगैर व्यक्तिगत रूप में जमाकर्ताओं को हुई हानि को पूरा करने के लिए उत्तरदायी होगा।

3. प्रविवरण में मिथ्या-प्रस्तुति होने पर (In case of Misrepresentation in Prospectus) [धारा 35 व 447] -
यदि यह सिद्ध हो जाए कि प्रविवरण, प्रार्थियों को धोखा देने के उद्देश्य या किसी कपटपूर्ण उद्देश्य के लिए जारी किया गया था तो प्रत्येक व्यक्ति, जो प्रविवरण जारी करने के समय कम्पनी का निदेशक था या जिसने निदेशक बनने के लिए सहमति दी थी या वह कम्पनी का प्रवर्तक था या जिसने प्रविवरण जारी करने की सहमति दी थी, या धारा 26, उप-धारा 5 में सन्दर्भित विशेषज्ञ था,

दायित्व की किसी सीमा के बगैर व्यक्तिगत रूप से किसी व्यक्ति द्वारा उठाई गई हानि की पूर्ति करने के लिए दायी होगा जिसने उस प्रविवरण के आधार पर प्रतिभूतियों के लिए प्रार्थना पत्र दिया था।

4. कम्पनी के स्वामित्व की जाँच करने की दशा में (In case of Investigation of Ownership of a Company) [धारा 216] -
यदि केन्द्र सरकार किसी कम्पनी के स्वामित्व की जाँच करना आवश्यक समझे तो यह एक या अधिक निरीक्षकों को कम्पनी और इसकी सदस्यता की जाँच करने व रिपोर्ट करने के लिए नियुक्त कर सकती है, वास्तविक व्यक्तियों को निर्धारित करने के लिए कि

(क) जो कम्पनी की वास्तविक या दृश्यमान सफलता या असफलता में वित्तीय रूप से हित

रखते हैं या रख चुके हैं; या (ख) जो कम्पनी का नियन्त्रण करने या उसकी नीतियों को प्रभावित करने में समर्थ हैं या रह चुके हैं।

इस उद्देश्य के लिए निरीक्षक कम्पनी का आवरण हटाकर स्वामित्व की वास्तविकता का पता

• लगा सकते हैं।

5. सूत्रधारी और सहायक कम्पनियाँ (Holding and Subsidiary Companies) [धारा 2, उप-धारा (46) और उप-धारा (87) ] -
सूत्रधारी कम्पनी का एक या अधिक कम्पनियों के सम्बन्ध आशय ऐसी कम्पनी से है जिसका उन कम्पनियों की 50% से अधिक अंशपूँजी पर अधिकार है या उनके निदेशक मण्डल के गठन पर अधिकार है। ऐसी दशा में पहली कम्पनी सूत्रधारी कम्पनी कहलाएगी और बाद वाली कम्पनी सहायक कम्पनी कानूनी रूप से ये दो कम्पनियाँ पृथक्-पृथक् अस्तित्व रखती है।

एवियु वेल अर्वन आर्ट डिस्ट्रीक्ट काउन्सिल बनाम साऊथ वेल्स ट्रैफिक एरिया लायसेन्सिंग अथॉरिटी (1951) 2K.B. 366 के विवाद में यह निर्णय दिया गया कि 100% सहायक कम्पनी भी पृथक् संस्था है और इसकी सूत्रधार कम्पनी इसके कार्यों के लिए उत्तरदायी नहीं होगी। इसी प्रकार से एक सूत्रधारी कम्पनी अपनी सहायक कम्पनी के अधिकारों को लागू नहीं करा सकती। [वैल बनाम लीवर ब्रादर्स लिमिटेड (1932) 2 A.C. 161]

परन्तु न्यायालय या प्राधिकरण कम्पनी के आवरण को हटा सकता है, सूत्रधारी कम्पनी और सहायक कम्पनी के बीच यह जानने के लिए कि वास्तव में कौन-कौन से व्यक्ति कम्पनियों का नियन्त्रण कर रहे हैं। अतः कुछ मामलों में कानून सूत्रधारी कम्पनी और सहायक कम्पनी को स्वतन्त्र या पृथक् संस्था न माने। उदाहरण के लिए, कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 129 के अनुसार जहाँ एक कम्पनी की एक या अधिक सहायक कम्पनियाँ हैं, इसे अपने वित्तीय विवरणों के अतिरिक्त, अपना और सारी सहायक कम्पनियों का समेकित विवरण (Consolidated Statement) बनाना होगा और वार्षिक सामान्य सभा में प्रस्तुत करना होगा। इसके अतिरिक्त सूत्रधारी कम्पनी को, सहायक कम्पनी में अपने हित के विवरण को निदेशक रिपोर्ट के साथ संलग्न करना होगा ताकि उनका पृथक् व्यक्तित्व स्पष्ट रूप से प्रतिबिम्बित हो सके।

6. प्रार्थना राशि वापस लौटाने में चूक करना (Failure to Return Application Money)-- यदि प्रविवरण जारी करने के 30 दिन के अन्दर या SEBI द्वारा बढ़ाई गई अवधि में न्यूनतम अभिदान के लिए प्रार्थना-पत्र प्राप्त न हो और प्रार्थना राशि प्राप्त न हो तो कम्पनी को प्राप्त राशि निर्धारित समय में निर्धारित तरीके से वापस कर देनी चाहिए। इसमें चूक होने पर कम्पनी तथा प्रत्येक अधिकारी जो दोषी हैं प्रत्येक भूल के लिए ₹ 1,000 प्रतिदिन की दर से जुर्माने का भागी होगा जब तक भूल जारी रहती है या एक लाख रुपये जो भी कम है।

ऐसी दशा में न्यायालय या प्राधिकरण कम्पनी का आवरण हटाकर दोषी अधिकारियों की पहचान कर सकता है। ये अधिकारी पृथक् अस्तित्व की आड़ में अपने व्यक्तिगत दायित्व से नहीं बच सकते। 


7. प्रार्थना राशि को अलग बैंक खाते में रखने में भूल करने पर या उसके गलत प्रयोग करने पर (Failure to keep the Application Money in a Separate Bank Account or not Utilising the same for Specified Purpose) (धारा 40] - कम्पनी द्वारा प्राप्त प्रार्थना राशि अंशों के आवण्टन न होने तक अलग बैंक खाते में रखना व निर्दिष्ट कार्यों के लिए प्रयोग करना अनिवार्य है। इसमें भूल होने पर प्रत्येक दोषी अधिकारी को एक वर्ष तक का कारावास या जुर्माना जो पचास रुपये से कम नहीं होगा और जो तीन लाख रुपये तक हो सकता है या दोनों दिए जा सकते हैं। ऐसी दशा में भी न्यायालय पृथक् अस्तित्व को अस्वीकार करके दोषी अधिकारियों को दकि 8. कम्पनी के साथ कपट या कुप्रबन्ध की जाँच की दशा मेंकर सकता है। (For Investigation of Affair of a Company in Case of Fraud or Mismanagement) (धारा 210 व 212) - केन्द्र सरकार रजिस्ट्रार या धारा 208 के अन्तर्गत निरीक्षक की रिपोर्ट पर या कम्पनी द्वारा विशेष प्रस्ताव पारित करपर या सार्वजनिक हित में कम्पनी के मामलों की जाँच का आदेश दे सकती है।वास्तविक रूप से दोषी व्यक्तियों की पहचान करने के लिए कम्पनी के आवरण को हटाया जA सकता है और उन्हें सजा दी जा सकती है।

Different between company and partnership 



कम्पनी (निगमन) की पहचान संख्या
[CORPORATE IDENTIFICATION NUMBER (CIN)] [धारा 12]

भारत सरकार ने आधार कार्ड की तरह, नवम्बर 2000 से निगमित होने वाली कम्पनियों को कम्पनियों के रजिस्ट्रार से कम्पनी पहचान संख्या (Corporate Identification Number) प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया है। कम्पनी के लिए इसकी पहचान संख्या (CIN) को व्यावसायिक पत्रों, बिल फार्मों, पत्रों की शीट, इसके सभी सूचना पत्रों (Notices) और अन्य कार्यालयी प्रकाशनों पर अंकित करना आवश्यक है। CIN में अंकों व अक्षर दोनों का उपयोग किया जा सकता है-अत: इसे अल्फान्यूमेरिक कैरेक्टर (Alpha Numeric Character) कहा जाता है। कम्पनी पहचान संख्या का उद्देश्य कम्पनियों के प्रबन्धन में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 का उपयोग करना है। इसके द्वारा कम्पनी की गतिविधियों की निगरानी सरलता से की जा सकेगी। उदाहरण के लिए, कम्पनी सूचीबद्ध है या नहीं, कम्पनी का समामेलन कब हुआ, किस राज्य में हुआ, कम्पनी सार्वजनिक है या निजी आदि।

Multiple choice questions 





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