B.com 3rd Semester History and administration of company legislation in india Chapter 2 Notes

भारतीय कम्पनी कानून का इतिहास और प्रशासन

परिचय (Introduction) 

भारत में कम्पनी कानून का उद्भव और विकास अँग्रेजी कम्पनी कानून के कारण हुआ है क्योंकि भारत अँग्रेजी राज के अधीन था। परन्तु स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में कम्पनी कानून का विकास बहुत तेजी से हुआ। भारत में प्रथम कम्पनी अधिनियम, 1850 में पारित हुआ, जो अँग्रेजी कम्पनी अधिनियम 1844 पर आधारित था। इसके अन्तर्गत कम्पनी के पंजीकरण का प्रावधान था। इस अधिनियम ने कम्पनी के पृथक् अस्तित्व को मान्यता दी। परन्तु इसने सीमित दायित्व का विशेषाधिकार प्रदान नहीं किया।

भारतीय कम्पनी अधिनियम, 1857 : यह अधिनियम, कम्पनी कानून के इतिहास में मील का पत्थर सिद्ध हुआ क्योंकि इसने पहली बार 'सीमित दायित्व' को मान्यता प्रदान की। परन्तु इसने बैंकिंग कम्पनियों तथा बीमा कम्पनियों को सीमित दायित्व की मान्यता प्रदान नहीं की।

भारतीय कम्पनी अधिनियम, 1860 यह अधिनियम अंग्रेजी कम्पनी अधिनियम, 1857 पर आधारित था। इसने बैंकिंग कम्पनियों और बीमा कम्पनियों को सीमित दायित्व की मान्यता प्रदान की। भारतीय कम्पनी अधिनियम, 1866: यह पहला व्यापक कम्पनी अधिनियम था जिसने कम्पनी के निगमन, नियमन और व्यापारिक कम्पनियों और अन्य संस्थाओं के समापन की व्यवस्था की। यह अधिनियम अंग्रेजी कम्पनी अधिनियम, 1862 पर आधारित था ।

भारतीय कम्पनी अधिनियम, 1882 : यह अधिनियम अँग्रेजी कम्पनी अधिनियम में उस समय तक किये गये संशोधनों को सम्मिलित करके उन्हें नवीनतम बनाने के लिए पारित किया गया था। कुछ साधारण संशोधन 1887, 1891, 1895 व 1910 में किये गये।

भारतीय कम्पनी अधिनियम, 1913 : इस अधिनियम ने प्रथम बार 'निजी कम्पनी' को मान्यता दी। यह पूर्ण रूप से अंग्रेजी कम्पनी अधिनियम, 1908 पर आधारित था।

भारतीय कम्पनी अधिनियम, 1936 : कम्पनी अधिनियम, 1913 भारत में प्रचलित व्यापार और वाणिज्य की कानूनी आवश्यकताओं की पहचान करने में असफल रहा। भारत में प्रचलित प्रबन्ध एजेन्सी प्रणाली (Managing Agency System) को नियमित करने की आवश्यकता ने 1936 के अधिनियम को पारित कराया। इस अधिनियम ने प्रबन्ध एजेन्सी प्रणाली की शर्तों के नियमन की व्यवस्था की।

कम्पनी अधिनियम, 1956: स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् केन्द्र सरकार ने देश में व्यापार, वाणिज्य व उद्योग का तेजी से विकास करने के लिए श्रीमान सी. एच. भाभा की अध्यक्षता में एक समिति गठित की। कम्पनी अधिनियम, 1936 द्वारा संशोधित कम्पनी अधिनियम, 1913 की कार्य प्रणाली (Working) पर रिपोर्ट देने के लिए।

भाभा समिति ने अप्रैल, 1952 में विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। कम्पनी अधिनियम, 1956 मुख्य रूप
से भाभा समिति की रिपोर्ट और अंग्रेजी कम्पनी अधिनियम, 1948 पर आधारित था। कम्पनी अधिनियम 1956, 1 अप्रैल, 1956 से लागू हुआ।

अधिनियम का क्षेत्र (Application of the Act ) - अधिनियम सारे भारत में लागू था, सिक्किम राज्य सहित।

अधिनियम का उद्देश्य (Object of the Act) - तत्कालीन वित्त मन्त्री डॉ. सी. डी. देशमुख के शब्दों में अधिनियम के उद्देश्य निम्नलिखित थे

(i) व्यावसायिक निष्ठा और कम्पनियों के प्रवर्तन और प्रबन्ध में व्यवहार का न्यूनतम मानदण्ड स्थापित करना।

(ii) कम्पनी के प्रबन्ध के सम्बन्ध में उचित सूचना और पूर्ण और उचित प्रकटीकरण 'सुनिश्चित करना।

(iii) अंशधारियों का प्रभावी रूप से भाग लेना व उनका नियन्त्रण और उनके उपयुक्त हितों की रक्षा सुनिश्चित करना।

(iv) कम्पनी के प्रबन्ध के लिए उत्तरदायी अधिकारियों द्वारा अपने कर्तव्य का उचित निष्पादन लागू करवाना।
(v) कम्पनी के मामलों की जाँच करने के लिए सरकार को सशक्त करना जहाँ कम्पनी का कारोबार कम्पनी, अंशधारियों और सार्वजनिक हितों के विरुद्ध चलाया जा रहा हो।

कम्पनी अधिनियम 1956 में संशोधन
(AMENDMENTS TO THE COMPANIES ACT, 1956)



कम्पनी अधिनियम, 1956 में इसके बनने के बाद समय-समय पर कई बार संशोधन किये गये। मुख्य संशोधन इस प्रकार हैं

1960, 1962, 1965, 1969, 1977, 1979, 1985, 1988, 1996, 1999, 2000, 2001,2002

कम्पनी अधिनियम, 2013 ( Companies Act, 2013) 8 अगस्त, 2013 को भारतीय संसद ने बहुत लम्बे इन्तजार के पश्चात् 57 वर्ष पुराने कम्पनी अधिनियम, 1956 को बदलने के लिए कम्पनी अधिनियम, 2013 को आखिर कार पारित कर दिया। नया कम्पनी कानून छोटे अंशधारियों को सशक्त, निगमित प्रशासन को सुचारु बनायेगा और बड़ी कम्पनियों को सामाजिक कल्याण पर अधिक व्यय करने देगा बड़े शीर्षक 'निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व' (Corporate Social Responsibility CSR) के अन्तर्गत ।

कम्पनी अधिनियम 2013 के प्रकाश स्तम्भ
(HIGHLIGHTS OF THE COMPANIES ACT, 2013)

निगमित मामलों के मंत्री (Minister of Corporate Affairs) श्री सचिन पायलट ने कम्पनी बिल प्रस्तुत करते हुए कहा कि नया कम्पनी कानून भारत के निगमित प्रशासन ढाँचे को 21वीं सदी के बदलते हुए व्यावसायिक परिवेश के अनुरूप बनायेगा।
अगले 2 या 3 दशकों तक यह नया कानून अर्थव्यवस्था में सकारात्मकता (Positivity) लायेगा।
कम्पनी कानून सभी हिताधिकारियों (Stockholders) के विचारों को, उद्योग चैम्बर सहित ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

यह अधिनियम निवेशकों को विशेष अदालतों के माध्यम से शीघ्र न्याय दिलायेगा और कानूनी विवाद लम्बे समय तक नहीं चलते रहेंगे।

निगमित सामाजिक दायित्व (Corporate Social Responsibility CSR) कम-से-कम ₹ 500 करोड़ शुद्ध मूल्य (Networth) वाली प्रत्येक कम्पनी अथवा वह कम्पनी जिसका वार्षिक आवृत (Turnover) ₹ 1,000 करोड़ या उससे अधिक हो या लाभ वर्ष में कम-से-कम ₹5 करोड़ है, अपने पिछले 3 वर्ष के औसत लाभ का 2% निगमित सामाजिक दायित्व पर खर्च करेगी।

छोटे अंशचारी (Small Shareholders ) — छेटे अंशधारी एसोसियेशन बना कर प्रवर्तकों और प्रबन्धकों के विरुद्ध वर्ग कार्यवाही मुकदमों (Class Action Suits) द्वारा अपने हितों की रक्षा कर सकेंगे, वे चाहें तो कम्पनी को अपने अंश सामूहिक रूप से उचित मूल्य पर बेच कर कम्पनी से मुक्ति पा सकेंगे।

स्वतन्त्र निदेशक (Independent Directors)

सूचीबद्ध सार्वजनिक (Listed Public Company) कम्पनी के निदेशक मण्डल के कम-से-कम एक-तिहाई निदेशक स्वतन्त्र निदेशक होंगे।

कम-से-कम एक महिला निदेशक की नियुक्ति (Appointment of at least one Woman Director) — सूचीबद्ध कम्पनी तथा अन्य विशिष्ट सार्वजनिक कम्पनी के निदेशक मण्डल में कम-से-कम एक महिला निदेशक होगी।

एक समान वित्तीय वर्ष (Uniform Financial Year) – प्रत्येक कम्पनी द्वारा एक समान वित्तीय वर्ष अपनाया जायेगा जो 31 मार्च को समाप्त होगा। परन्तु विदेशी कम्पनी को प्राधिकरण की अनुमति से अन्य वित्तीय वर्ष अपनाने की आज्ञा होगी जो उसकी सूत्रधारी विदेशी कम्पनी के वित्तीय वर्ष के अनुसार हो सकता है।

अंकेक्षकों का बदलना (Rotation of Auditors) सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और बैंकों की भाँति अब प्रत्येक कम्पनी अपने अंकेक्षकों को अधिकतम 5 वर्ष की अवधि तक नियुक्त कर सकेगी, इसके पश्चात् उन्हें बदलना होगा। इससे प्रबन्ध और अंकेक्षकों के बीच अपवित्र साठगांठ और लेखों में हेराफेरी करने पर रोक लग सकेगी।

अन्तर्निगमित ऋणों के लिए नियम और सह संस्था और सहायक कम्पनियों के जाल फैलाने के लिए मानदण्ड (Rules for Inter Corporate Loans and Norms for Creation of Web of Sister Concern and Subsidiary )—नया कानून पहली बार सह संस्थाओं और सहायक कम्पनियों का निर्माण करने के लिए मानदण्ड स्थापित करेगा।

गम्भीर कपट जाँच कार्यालय की व्यवस्था (Serious Fraud Investigation Office ) — एक शक्तिशाली कपट जाँच कार्यालय की स्थापना जो सख्त दण्डात्मक कार्यवाही करने के लिए अधिकृत होगा
और विशिष्ट मामलों में निगमित अपराधियों को गिरफ्तार कर सकेगा और सजा दे सकेगा।

स्वतन्त्र निदेशक की अधिकतम नियुक्ति केवल 5 वर्ष तक (Independent Director to Hold Office for a Maximum Period of 5 Years) स्वतन्त्र निदेशक केवल 5 वर्ष तक एक कम्पनी में पद पर नियुक्त किया जा सकेगा। एक व्यक्ति एक ही कम्पनी में लगातार केवल 2 बार स्वतन्त्र निदेशक के पद पर नियुक्त हो सकेगा। वह प्रवर्तकों द्वारा स्वतन्त्र अंकेक्षकों पर अनुचित दबाव पर रोक लगा सकेगा।

स्वयं नियमन और न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप (Self Regulation and Minimum Government Interference) अन्त में किन्तु सबसे कम महत्व का नहीं, नया कानून स्वयं नियमन और न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप पर जोर देगा ताकि प्रबन्ध कम्पनी के अधिक प्रकटीकरण स्तर पर वर्तमान सरकारी अनुमोदन राज (Government Approval Requirement) के विरुद्ध स्वतन्त्र रूप से कम्पनी के लिए कार्य करता रहे।

कम्पनी (संशोधन) अधिनियम, 2015 - कम्पनी अधिनियम, 2013 में संशोधन कम्पनी (संशोधन)अधिनियम, 2015 द्वारा किया गया है। यह संशोधन विभिन्न हिताधिकारियों (उद्योग चैम्बर्स, पेशेवरों,संस्थानों, कानूनी विशेषज्ञों और मंत्रालयों विभागों) से प्राप्त प्रतिवेदनों के आधार पर किया गया है।प्रमुख संशोधन निम्न प्रकार हैं

(i) कम्पनियों की न्यूनतम चुकता पूंजी की आवश्यकता समाप्त (No Need of Minimum Paid up Capital) (धारा 2 के वाक्य 68 व 71 और धारा 11 ) - संशोधित अधिनियम, 2015 के अनुसार अब निजी अथवा सार्वजनिक कम्पनी के लिए न्यूनतम चुकता पूंजी होना आवश्यक नहीं जो क्रमश: ₹ एक लाख और पांच लाख थी।

(ii) सार्वमुद्रा का प्रयोग एच्छिक (Use of Common Seal Optional) (धारा 9, 12, 22, 46 और 223)- अब प्रपत्रों के प्रमाणीकरण के लिए सार्वमुद्रा का प्रयोग ऐच्छिक कर दिया गया है।

(iii) कम्पनी कानून के प्रावधानों के विरुद्ध कम्पनी द्वारा जमा स्वीकार करने पर दण्ड (Punishment for Accepting Deposits in violation of the Companies Act ) - संशोधित (अधिनियम) 2015 ने धारा 76 से एक नई धारा 76A जोड़कर कम्पनियों द्वारा कानून का उल्लंघन करने पर दण्ड की व्यवस्था की है।

(iv) कम्पनी के निदेशक मंडल के प्रस्ताव के सार्वजनिक निरीक्षण पर कुछ दशाओं में रोक (Prohibition of Public Inspection of Board Resolution ) - रजिस्ट्रार के यहाँ फाइल किये गए कुछ प्रस्तावों के सार्वजनिक निरीक्षण पर रोक लगा दी गई है धारा 171 (3) (g)। (v) पिछली हानि और ह्रास की राशि को अपलिखित किये बगैर वर्ष के लिए लाभांश की घोषणा पर रोक (No Dividend can be Declared Without writing off past losses and depreciation)- (धारा 123) (1)- एक कम्पनी चालू वर्ष के लिए लाभांश की घोषणा करने से पहले पिछले वर्षों की हानि और हास की राशि को अपलिखित करेगी।

(vi) अगर लाभांश का लगातार 7 वर्षों तक दावा न किया जाय तो इसकी राशि को निवेशक शिक्षा और सुरक्षा कोष में हस्तान्तरित किया जाएगा (In Case Dividend has not been Claimed per seven consecutive years or more the same shall be transferred to the Investor Education and Protection Fund) (धारा 124) -संशोधन के अनुसार ऐसा लाभांश ही निवेशक शिक्षा और सुरक्षा कोष में हस्तान्तरित किया जाएगा जिसके लिये दावा लगातार 7 वर्षों तक न किया गया हो।

(vii) केन्द्र सरकार को कपट रिपोर्ट करने की सीमा (Threasholds beyond which fraud shall be reported to the Central Government) (धारा 134 व 143 (1)] - संशोधन से पहले सभी कपट केन्द्र सरकार को रिपोर्ट किये जाने थे। संशोधन के अनुसार एक निर्धारित सीमा तक कष्ट केन्द्र सरकार को और उससे कम राशि के अंकेक्षण समिति को रिपोर्ट किये जाएंगे।

(viii) धारा 177 (4) वाक्य (iv) में संशोधन | Ammendment in Sec. 177 (4) Clause (iv)]-संशोधन के अनुसार अंकेक्षण समिति को सम्बन्धित पक्ष लेन-देनों को अनुमोदित करने का सीमित अधिकार दिया गया है।
(ix) धारा 185 के अन्तर्गत पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कम्पनियों को ऋण अथवा गारण्टी देने के लिए छूट प्रदान करना ।

(x) धारा 188(1) में संशोधन विशेष प्रस्ताव के स्थान पर प्रस्ताव द्वारा सम्बन्धित पक्ष लेन-देनों का अनुमोदन करने के लिए। (xi) धारा 188(1) में संशोधन सूत्रधारी कम्पनी और पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कम्पनी के बीच सम्बन्धित पक्ष लेन देनों के अनुमोदन के लिए गैर सम्बन्धित अंशधारियों की सहमति से छूट देने के लिए।

कम्पनी (संशोधन) अधिनियम, 2017 की विशेषताएँ (High Lights):

1. धारा 2 जो परिभाषाओं से सम्बन्धित है, निम्नलिखित महत्वपूर्ण संशोधन किये हैं

(i) वाक्यांश (6) में महत्वपूर्ण प्रभाव को नया स्पष्टीकरण दिया गया है ताकि कोई भ्रम न रहे।
इसी प्रकार से संयुक्त उपक्रम का नया स्पष्टीकरण दिया है।

(ii) वाक्यांश (28) में लागत लेखाकर अधिनियम का नाम बदलने से लागत लेखाकार की परिभाषा को स्पष्ट किया है।

(iii) वाक्यांश (41) में सहायक कम्पनी के साथ एशोसिएट कम्पनी का नाम भी जोड़ा गया है।

(iv) वाक्यांश (46) में कम्पनी के अर्थ को स्पष्ट किया गया है।

(v) वाक्यांश (49) को समाप्त कर दिया है।

(vi) वाक्यांश (57) में लाभ-हानि खाते का नाम या जमा शेष को भी सम्मिलित किया है।

(vii) वाक्यांश (85) में 5 करोड़ रुपये की सीमा को बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये कर दिया गया है।

(viii) वाक्यांश (91) में आवृत का अर्थ अधिक स्पष्ट किया गया है।

2. धारा 3 – धारा 3 में नई धारा 3A जोड़कर स्पष्ट किया है कि किन परिस्थितियों में कम्पनी के सदस्यों का दायित्व असीमित हो जाएगा।

3. धारा 4 में संशोधन करके नई कम्पनी न वर्तमान कम्पनी के नाम को रजिस्ट्रार द्वारा सुरक्षित रखने की अवधि में संशोधन किया है।

एक व्यक्ति तकनीकी सदस्य (Technical member) नियुक्त होने के योग्य नहीं होगा जब कि--

(a) वह भारतीय कम्पनी कानून सेवा का या भारतीय कानून सेवा का कम से कम 15 वर्ष सदस्य रहा है और भारत सरकार में सचिव या अतिरिक्त सचिव के पद पर कार्य कर रहा है, या

(b) (c) (d) वह 15 वर्ष से प्रैक्टिसिंग चार्टड एकाउन्टेन्ट, लागत एकाउन्टेन्ट या कम्पनी सचिव है या रहा है।

(e) वह योग्यता सिद्ध, निष्ठावान और समाज में स्थान रखने वाला व्यक्ति है और जिसके पास औद्योगिक वित्त, औद्योगिक प्रबन्धन, औद्योगिक पुर्नगठन, निवेश और लेखांकन का कम से कम 15 वर्षों का अनुभव है। (f) वह श्रमिक न्यायालय या प्राधिकरण या औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अन्तर्गत गठित राष्ट्रीय अधिकरण का कम से कम 5 वर्षों के लिए प्रमुख अधिकारी है या रहा है।

4. धारा 26 में प्रविवरण में प्रतिभूति और विनिमय मण्डल द्वारा निर्दिष्ट जानकारी और रिपोर्ट प्रविवरण में दी जानी आवश्यक कर दी गई है। 5. धारा 53 में संशोधन से एक कम्पनी कुछ दशाओं में कटौती पर अंश जारी कर सकती है। 6. धारा 73 में संशोधन के द्वारा निक्षेप धारकों को धन वापस लोटाने के लिए प्रति वर्ष वापस दिये जाने वाले निक्षेप की 20% राशि निक्षेप वापसी संचित खाते में हस्तान्तरित की जायेगी। 17. धारा 74 में कम्पनी अधिनियम, 1956 या उससे पहले के कम्पनी कानून के अन्तर्गत लिए गये सार्वजनिक निक्षेप की कम्पनी अधिनियम, 2013 के लागू होने के 3 वर्ष में या उनकी अवधि समाप्त होने पर निक्षेप धारकों को लौटाना। 8. नई धारा 76A के द्वारा निक्षेप वापस न लौटाने के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था की गई है। 9. धारा 117 में संशोधन करके उल्लंघन के लिए जुर्माने की राशि आधी कर दी है। 10. धारा 123 में संशोधन के अनुसार चालू वित्त वर्ष में अगर कम्पनी को हानि हुई है तो कम्पनी तुरन्त पिछले तीन वित्तीय वर्षों के औसत लाभ से अधिक दर पर अन्तरिम लाभांश घोषित नहीं करेगी।

11. धारा 129 में संशोधन के अनुसार एक कम्पनी जिसकी एक या अधिक सहायक कम्पनी या एशोसिएट कम्पनी है तो ऐसी कम्पनी अपना और सभी सहायक और एशोसिएट कम्पनियों का समकित वित्तीय विवरण ऐसे प्रारूप में बनाएगी जैसा निर्दिष्ट किया जाए। ऐसे समेकित वित्तीय विवरण कम्पनी द्वारा उपधारा (3) के अन्तर्गत बनाये जाने वाले वित्तीय विवरण के अतिरिक्त होगा। 12. धारा 130 में संशोधन के अनुसार एक कम्पनी के लेखा पुस्तकों को चालू वर्ष से तुरन्त के पिछले 8 वित्तीय वर्षों से अधिक की अवधि के लिए पुनः खोलने का आदेश नहीं दिया जा सकता। बशर्ते कि जहाँ धारा 128 को उप-धारा (5) के अन्तर्गत यदि केन्द्रीय सरकार लेखा पुस्तकों को तुरन्त के पिछले 8 वित्तीय वर्षों से अधिक अवधि के लिए पुनः खोलने का आदेश दिया है तो उस दशा में उपरोक्त में कथित अवधि से अधिक समय के लिए खातों को पुनः खोलने का आदेश दिया जा सकता है।

13. धारा 134 में संशोधन के अनुसार कम्पनी के वित्तीय विवरण समेकित वित्तीय विवरण सहित। अंकेक्षक द्वारा उन पर रिपोर्ट देने के लिए निदेशक मण्डल द्वारा स्वीकृत किए जायेंगे। कम्पनी के अध्यक्ष द्वारा उन पर हस्ताक्षर करने से पहले जहाँ उसे मण्डल द्वारा अथवा दो निर्देशकों द्वारा जिनमें से एक प्रबन्ध निदेशक हो, यदि कोई है और मुख्य कार्यकारी अधिकारी, मुख्य वित्त अधिकारी और कम्पनी सचिव जहाँ उन्हें नियुक्त किया। गया है या एक व्यक्ति वाली कम्पनी की दशा में केवल एक निदेशक द्वारा । 14. धारा 147 में संशोधन के द्वारा न्यूनतम जुमनि की राशि एक लाख रुपये से कम करके पचास हजार रुपये कर दी गई है परन्तु अधिकतम राशि 25 लाख रुपये या अंकेक्षक के पारिश्रमिक से 8 गुना जो भी कम हो कर दी गई है बशर्ते कि जुमनि के अतिरिक्त सजा की दिशा में फर्म का वही अंकेक्षक उत्तरदायी होगा जो कपट का अपराधी है या अपराध में साथी है

15. धारा 177 में संशोधन के अनुसार अगर कोई निदेशक एक करोड़ रुपये या अधिक का लेन-देन अंकेक्षण समिति की स्वीकृति के करता है और अंकेक्षण समिति उसकी लेन-देन के तीन माह के भीतर पुष्टि नहीं करती है तो ऐसा लेनदेन अंकेक्षण समिति की इच्छा पर व्यर्धनीय होगा और सम्बन्धित निदेशक व सम्बन्धी कम्पनी की क्षतिपूर्ति करने के लिए दायी होगा।

16. धारा 185 - (1) में संशोधन के अनुसार एक कम्पनी के निर्देशक को या इसकी सूत्रधारी कम्पनी के
(i) निदेशक को या ऐसे निदेशक के साझेदार या रिश्तेदार को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कोई ॠण, पुस्तक द्वारा ॠण सहित गारण्टी या प्रतिभूति नहीं देगी।
(ii) किसी फर्म को जिसमें ऐसा निदेशक या रिश्तेदार, साझेदार है। (2) बशर्ते कि एक कम्पनी कोई ऋण, बुक पुस्तक ऋण सहित, ऐसे किसी व्यक्ति को, जिसमें कम्प के निदेशक का हित हो, ऋण, गारण्टी या प्रतिभूति दे सकता है---- (a) कम्पनी ने साधारण सभा में एक विशेष प्रस्ताव पारित कर लिया है बशर्ते कि सम्बन्धित साधारण सभा की सूचना के स्पष्टीकरण विवरण में ऋण लेने का पूर विवरण और उद्देश्य व अन्य आवश्यक तथ्य जिसके लिए ऋण, गारण्टी या प्रतिभूति दी गई है दे दिया गया है।
(b) ऋण लेने वाली कम्पनी ने ऋण अपने मुख्य व्यावसायिक उद्देश्य से लिए उपयोग किया है।

17. धारा 379 में संशोधन के अनुसार धारा 380 से 386 व 390 और 392 सभी विदेशी कम्पनियों परहैं। लागू बशर्ते केन्द्र सरकार गजट में अधिसूचना प्रकाशित करके विदेशी कम्पनियों को उपरोक्त किसी भी धारा से छूट दे सकती है। ऐसी अधिसूचना संसद के दोनों सदनों में स्वीकृति के लिए रखी जाएगी। 18. धारा 403 में संशोधन के अनुसार अगर कोई कम्पनी धारा 92 और 137 के अन्तर्गत कोई दस्तावेज, तथ्य या सूचना निर्धारित समय में जमा या फाइल नहीं करती है तो किसी अन्य कानूनी कार्यवाही या दायित्व के बावजूद जुर्माने के साथ ऐसे दस्तावेज, तथ्य या सूचना फाइल कर सकती है अतिरिक्त फीस के साथ जो ₹ 100 प्रतिदिन से कम नहीं होगी और विभिन्न वर्गो की कम्पनियों के लिए विभिन्न राशि निर्धारित की जा सकती है। दूसरी या तीसरी बार भूल होने पर जुर्माने की राशि उपरोक्त जुर्माने की राशि के दुगने से कम नहीं होगी अन्य कार्यवाही या दायित्व के साथ। जुर्माने के अतिरिक्त दोषी अधिकारी उप-धारा में निर्दिष्ट सजा व जुर्माने के दोषी होंगे। 19. धारा 446 में धारा 446A जोड़ी गई है जिसके अन्तर्गत विशेष अदालत जुर्माने या सजा निश्चित करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखेगी-- (a) कम्पनी का आकार; (b) कम्पनी के व्यवसाय की प्रकृति; (c) सार्वजनिक हित की हानि; (d) चूक या भूल की प्रकृति; और (e) भूल की पुर्नवर्ती 20. धारा 446 में नई धारा 446B जोड़ी गई है जिसके अनुसार एक व्यक्ति वाली कम्पनी के द्वारा धारा 92 की उपधारा (5), धारा 117 की उप-धारा (2) और धारा 137 की उपधारा के उल्लंघन के लिए जुर्माना और सजा की मात्रा अन्य कम्पनियों की तुलना में आधी होगी। 21. धारा 447 कम्पनी अधिकारियों द्वारा किये जाने वाले कपट के सम्बन्ध में मात्रा का वर्णन किया गया है। इसके अनुसार कपट के लिए जुर्माने की राशि कम से कम दस लाख रुपये या कम्पनी के आवृत के एक प्रतिशत के बराबर होगी, जो भी कम है। यदि कपट की मात्रा उपरोक्त राशि या आवृत से कम है और सार्वजनिक हित को हानि नहीं है तो 5 वर्ष तक की सजा और 20 लाख रुपये तक के जुर्माने की या दोनों की व्यवस्था है

कम्पनी कानून प्रशासन
(COMPANY LAW ADMINISTRATION)

राष्ट्रीय कम्पनी कानून प्राधिकरण की स्थापना (Constitution of National Company Law Tribunal) कम्पनी (संशोधन) अधिनियम 1962 के बाद से कम्पनी कानून प्रशासन में कम्पनी कानून मण्डल (Company Law Board) का महत्वपूर्ण योगदान रहा। परन्तु कम्पनी (संशोधन) अधिनियम, 2002 के द्वारा इसे समाप्त करके राष्ट्रीय कम्पनी कानून प्राधिकरण (National Company Law Tribunal) की स्थापना की गई। तद्नुसार, जो मामले कम्पनी कानून मण्डल के समक्ष लम्बित थे अब राष्ट्रीय कम्पनी कानून प्राधिकरण को हस्तान्तरित कर दिये जायेंगे। कम्पनी प्राधिकरण को इस अधिनियम और अन्य अधिनियमों के अन्तर्गत अधिकार व शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। इसके अतिरिक्त कुछ अधिकार जो पहले उच्च न्यायालय के पास थे इसे हस्तान्तरित कर दिये गये हैं और केन्द्र सरकार को हस्तान्तरित कर दिये गये हैं। कुछ अधिकार

राष्ट्रीय कम्पनी कानून प्राधिकरण का गठन (Composition of National Company Law Tribunal) [धारा 408]-प्राधिकरण में एक प्रधान और उतनी संख्या में न्यायिक तथा तकनीकी सदस्य होंगे जो केन्द्र सरकार उचित समझे।

प्राधिकरण के प्रधान और सदस्यों की योग्यताएँ (धारा 409) (Qualification of President and Members of Tribunal) ( 1 ) प्रधान एक व्यक्ति होगा जो उच्च न्यायालय का जज हो या उसने 5 वर्ष जज के पद पर कार्य किया है। (2) एक व्यक्ति न्यायिक सदस्य नियुक्त होने के योग्य नहीं होगा जब तक कि---

(a) वह उच्च न्यायालय का जज है या रहा है; या
(b) जिला जज है या कम-से-कम 5 वर्ष के लिए जज के पद पर रहा है।
(c) एक न्यायालय में 10 वर्ष तक वकालत की है।

स्पष्टीकरण (Explanation) – वाक्यांश (c) के उद्देश्यों के लिए, अवधि की गणना करते समय जिसमें एक व्यक्ति न्यायालय का वकील रहा है उसमें उस अवधि को जोड़ा जायेगा जिस अवधि में उस व्यक्ति ने न्यायिक पद या प्राधिकरण में सदस्य का पद या केन्द्र या राज्य सरकार में किसी पद पर कार्य किया है, वकील बनने के बाद ।

प्रधान और सदस्यों के पद की अवधि (Term of Office of President and Members) [ धारा 413] — प्रधान और प्राधिकरण का प्रत्येक सदस्य अपने पद का भार सम्भालने की तिथि से 5 वर्षों तक पद पर बना रहेगा, परन्तु वह 5 वर्ष की पुनः नियुक्ति के लिए सक्षम होगा।

बशर्ते कि प्रधान और कोई भी अन्य सदस्य पद पर बना नहीं रहेगा, जब उसने---

(a) प्रधान की दशा में 67 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है;
(b) अन्य सदस्य की दशा में 65 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है -

बशर्ते कि प्रधान और अन्य सदस्य अपने मूल संगठन (Parent Cadre), मन्त्रालय या विभाग पर पूर्वाधिकार (Lien) रख सकते हैं, जैसी भी स्थिति हो इस पद पर कार्य करते समय, उपरोक्त पूर्वाधिकार एक वर्ष से अधिक नहीं हो सकता।

प्रधान व अन्य सदस्यों के वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तें (Salary, Allowances and other Terms and Conditions of Service of President and Other Members) [धारा 414] - प्रधान व अन्य सदस्यों और वेतन भत्ते की सेवा शर्तें वही होंगी जो निर्धारित की जाए, बशर्ते कि न तो वेतन और न ही भत्ते और न ही सेवा की अन्य शर्तें उनकी नियुक्ति के बाद उनके लिए पहले से कम होगी।

प्राधिकरण में पद की रिक्तता (Vacancy in Tribunal) (धारा 415)

(1) प्राधिकरण के प्रधान के कार्यालय में रिक्त स्थान होने पर, उसकी मृत्यु त्यागपत्र के कारण या अन्य तो सबसे वरिष्ठ सदस्य प्रधान के पद पर कार्य करेगा उस तिथि तक जब तक कि नया प्रधान इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार उस रिक्त स्थान पर पद का भार न सम्भाल ले।

(2) जब प्रधान, अनुपस्थिति, बीमारी या अन्य किसी कारण से अपना कार्य करने में असमर्थ है तो सबसे वरिष्ठ सदस्य या जैसी भी स्थिति हो, केन्द्र सरकार द्वारा अधिसूचना के द्वारा मनोनीत प्राधिकरण का सदस्य प्रधान का पद सम्भालेगा जब तक प्रधान अपना पद वापस नहीं सम्भाल लेता।

(3) यदि अस्थायी अनुपस्थिति के अतिरिक्त अन्य कारण से प्रधान के कार्यालय में या सदस्यों के स्थान पर रिक्तता होती है तो केन्द्र सरकार इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार किसी अन्य व्यक्ति को रिक्त स्थान भरने के लिए नियुक्त करेगी और प्राधिकरण के आगे कार्यवाही उस अवस्था तक जारी रहेगी जब तक रिक्त स्थान न भर लिया जायेगा। प्रधान और सदस्य द्वारा त्याग-पत्र (Resignation of President and Members) (धारा 416) –प्रधान या सदस्य अपने हाथ से लिखित सूचना केन्द्र सरकार को सम्बोधित करके अपने पद से त्याग-पत्र दे सकता है, बशर्ते कि प्रधान, अध्यक्ष या सदस्य पद पर 3 महीने तक बने रहेंगे, केन्द्र सरकार द्वारा ऐसी सूचना मिलने की तिथि से या उसके स्थान पर नियुक्त व्यक्ति अपना पद सम्भाल लेता है या उसके पद की अवधि समाप्त होने तक जो भी पहले हो। •

सदस्यों को पद से हटाना (Removal of Members) (धारा 417) ( 1 ) – केन्द्र सरकार भारत के मुख्य न्यायाधीश से विचार-विमर्श करके, प्रधान, अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को पद से हटा सकती है, जो (a) दिवालिया घोषित हो गया है; या

(b) सरकार की दृष्टि में नैतिक पतन का अपराधी है; या
(c) जो भौतिक या मानसिक रूप से प्रधान, अध्यक्ष या सदस्य के पद पर कार्य करने के अयोग्य हो गया है, या
(d) वित्तीय या अन्य हित प्राप्त करने के कारण प्रधान, अध्यक्ष या सदस्य का कर्तव्य पूरा करने को पक्षपातपूर्ण रूप से प्रभावित करता है; या
(e) अपने पद का दुरुपयोग करता है जो उसके पद पर बने रहना सार्वजानिक हित के विरुद्ध होगा। बशर्ते कि उपरोक्त व्यक्तियों को पद से हटाने के पहले सुनवाई का उचित अवसर दिया जायेगा।

(2) उपरोक्त व्यक्तियों को केवल केन्द्र सरकार द्वारा दिये गए आदेश के द्वारा पद से हटाया जायेगा, भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा मनोनीत जज द्वारा पूछताछ के बाद दुराचरण या अयोग्यता सिद्ध होने पर।

प्राधिकरण की बैंच (Benches of Tribunal) (धारा 419)
(1) प्राधिकरण की उतनी बैंचें स्थापित की जायेंगी जितनी केन्द्र सरकार अधिसूचना द्वारा निर्दिष्ट करे।
(2) प्राधिकरण की मुख्य बेंच (Principal Bench ) नई दिल्ली में स्थित होगी जिसकी अध्यक्षता प्राधिकरण के प्रधान द्वारा की जायेगी।
(3) प्राधिकरण की शक्तियों का प्रयोग 2 सदस्यों वाली बेंच द्वारा किया जायेगा जिसमें से एक न्यायिक सदस्य और दूसरा तकनीकी सदस्य होगा। बशर्ते कि प्राधिकरण के सदस्य के लिए सक्षम होगा अकेले सदस्य को बैंच के रूप में कार्य करना और बैंच की शक्तियों का प्रयोग करना उन मामलों के सम्बन्ध में या वर्गों के मामलों के सम्बन्ध में जो प्रधान विशेष या सामान्य आदेश द्वारा निर्दिष्ट करें पुनः ऐसे मामले या वर्ग की सुनवाई के समय सदस्य को लगे कि ऐसे मामले या वर्ग की सुनवाई दो सदस्यों वाली बेंच द्वारा की जाए तो प्रधान द्वारा मामले का हस्तान्तरण ऐसी बैच को कर दिया जाएग जैसा प्रधान उचित समझे।

(4) कम्पनियों के पुन: स्थापन, पुनः ढाँचा बनाने, पुनः जीवित या समापन से सम्बन्धित मामलों को निपटाने के लिए प्रधान एक या अधिक विशेष बेंच स्थापित करेगा जिनमें 3 या अधिक सदस्य होंगे और आवश्यक रूप से न्यायिक सदस्य बहुमत में होंगे।

(5) यदि बैच के सदस्यों का किसी बिन्दु या बिन्दुओं पर मतभेद है तो यह बहुमत से निर्णीत किया जायेगा। यदि वहाँ सदस्यों में बराबर का मतभेद हैं तो वै बिन्दु या बिन्दुओं का वर्णन करेंगे और मामले को प्रधान द्वारा इस बिन्दु (बिन्दुओं पर सुनवाई के लिये अन्य सदस्य या सदस्यों को सन्दर्भित किया जायेगा और उसका बहुमत से निर्णय किया जायेगा। दीवानी न्यायालय को सुनवाई का अधिकार नहीं (Civil Court not to have Jurisdiction) (धारा 430) - किसी भी दीवानी न्यायालय को किसी मुकदमे के सम्बन्ध में सुनवाई का अधिकार नहीं होगा जो प्राधिकरण या अपीलीय प्राधिकरण इस अधिनियम के अन्तर्गत या अन्य कानून के अन्तर्गत निर्णित कर सकता है और न ही कोई निषेध आज्ञा (Injunction) किसी न्यायालय या अधिकरण द्वारा जारी की जायेगी इस अधिनियम या अन्य कानून द्वारा दी गई शक्तियों के प्राधिकरण या अपीलीय प्राधिकरण द्वारा प्रयोग से किसी कार्यवाही को रोकने के लिए। राष्ट्रीय कम्पनी कानून अपीलीय प्राधिकरण की स्थापना (Constitution of National Company Law Appelate Tribunal) (धारा 410 ) – केन्द्रीय सरकार सरकारी राजपत्र में अधिसूचना जारी करके राष्ट्रीय कम्पनी कानून अपीलीय प्राधिकरण की स्थापना करेगी जो निर्दिष्ट तिथि से अपना कार्य करना प्रारम्भ कर देगा। इसमें केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त एक अध्यक्ष तथा अधिकतम 11 (ग्यारह) सदस्य होंगे। यह राष्ट्रीय कम्पनी कानून प्राधिकरण के निर्णयों के विरुद्ध अपील पर विचार करेगा। अपीलीय प्राधिकरण के निर्णयों के विरुद्ध अपील उच्चतम न्यायालय में की जा सकेगी।
अपीलीय प्राधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों की योग्यताएँ (Qualifications ofChairperson and Members of Appelate Tribunal) (धारा 410 )

(1) अध्यक्ष वह व्यक्ति होगा जो उच्चतम न्यायालय का जज है या रहा है या उच्च न्यायालय का मुख्य जज है या रहा है। (2) न्यायिक सदस्य वह व्यक्ति होगा जो उच्च न्यायालय का जज है या रहा है या 5 वर्षों के लिए प्राधिकरण का न्यायिक सदस्य रहा है।
(3) तकनीकी सदस्य योग्यता- सिद्ध, निष्ठावान और प्रतिष्ठावान हो और जिसे कानून, उद्योग, वित्त, औद्योगिक प्रबन्ध या औद्योगिक प्रशासन, पुनः निर्माण, निवेश, लेखाविधि, श्रमिक सम्बन्धी विषयों या ऐसे अन्य प्रबन्ध विषय, मामलों का सुलझाना, पुनः जीवन, पुनः स्थापन और कम्पनियों के समापन का ज्ञान और कम-से-कम 25 वर्षों का अनुभव हो।
प्राधिकरण और अपीलीय प्राधिकरण के सदस्यों का चुनाव (Selection of Members of
Tribunal and Appelate Tribunal) (धारा 412 )
(1) प्राधिकरण के प्रधान और अपीलीय प्राधिकरण के अध्यक्ष और अपीलीय प्राधिकरण के सदस्यों का चुनाव भारत के मुख्य न्यायाधीश से विचार-विमर्श करके किया जायेगा। (2) प्राधिकरण के सदस्यों और अपीलीय प्राधिकरण के तकनीकी सदस्यों का चुनाव, चयन समिति की सिफारिशों पर किया जायेगा जिसमें सम्मलित होंगे (a) भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनका नामित व्यक्ति-अध्यक्ष; (b) उच्चतम न्यायालय का वरिष्ठ न्यायाधीश या एक उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश- सदस्य; (c) निगमित मामलों के मन्त्रालय का सचिव- सदस्य (d) कानून व न्याय मन्त्रालयका सचिव सदस्य; और (e) वित्त मन्त्रालय के वित्तीय विभाग का सचिव सदस्य (3) निगमित मामलों के मन्त्रालय का सचिव चयन समिति का संयोजक (Convenor) होगा।

(4) चयन समिति, उपवाक्य (2) के अन्तर्गत चयन के लिए सिफारिश की प्रविधि निर्धारित करेगी।
(5) प्राधिकरण या अपीलीय प्राधिकरण के किसी सदस्य की नियुक्ति केवल इस कारण से अवैध नहीं होगी कि चयन समिति में कोई पद रिक्त था अथवा उसके गठन में कोई कमी थी।

टिप्पणी- प्राधिकरण व अपीलीय प्राधिकरण के प्रधान, अध्यक्ष व सदस्यों के चुनाव के सम्बन्ध में, उनके वेतन, भत्ते आदि, सेवा की शर्तों के सम्बन्ध में प्रावधान, एक समान हैं। अत: उनका अलग से विवेचन नहीं किया जा रहा है।

कम्पनी कानून का प्रशासन
(ADMINISTRATION OF COMPANY LAW)

कम्पनी अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए निम्नलिखित तन्त्र (Machinery) की स्थापना की गई है। केन्द्र सरकार (Central Government ) — केन्द्र सरकार प्रशासन का मुख्य स्रोत (Fountain Head) है। यह निगमित मामलों के मंत्रालय (Ministry of Corporate Affairs) के माध्यम से कार्य करता है। क्षेत्रीय निदेशक (Regional Directors) — देश को चार क्षेत्रों में बाँटा गया है, प्रत्येक का अपना क्षेत्रीय कार्यालय (Regional Office) है। चार क्षेत्र कानपुर (उत्तर), मुम्बई (पश्चिम), कोलकाता (पूर्व) और चेन्नई (दक्षिण) । क्षेत्रीय कार्यालय उन शक्तियोजन कार्यो को करने के लिए अधिकृत हैं जो उन्हें केन्द्रीय सरकार का निगमित मामलों का मन्त्रालय सौंपे। ये क्षेत्रीय निदेशक केन्द्र सरकार के नियन्त्रण और निरीक्षण में कार्य करते हैं।

कम्पनी रजिस्ट्रार कार्यालय (Registration Offices) धारा (396) (1) ऐसी शक्तियों और कार्यों को करने के लिए केन्द्र सरकार कम्पनी अधिनियम के द्वारा या अन्तर्गत या उसके अन्तर्गत बनाये गये नियमों और इस अधिनियम के अन्तर्गत कम्पनियों के पंजीकरण के उद्देश्य के लिए अधिसूचना जारी करके उतनी संख्या में और ऐसे स्थानों पर पंजीकरण कार्यालय (Registration Offices) स्थापित करेगी जैसा वह उपयुक्त समझे उनके क्षेत्र को निर्धारित करते हुए। (2) केन्द्रीय सरकार ऐसी संख्या में रजिस्ट्रार, अतिरिक्त रजिस्ट्रार, उप रजिस्ट्रार और सहायक रजिस्ट्रार नियुक्त करेगी जैसा यह आवश्यक समझे। कम्पनियों के पंजीकरण के लिए और इस अधिनियम के अन्तर्गत विभिन्न कार्यों, शक्तियों और कर्तव्यों को पूरा करने के लिए जो उन अधिकारियों द्वारा प्रयोग की जा सकेंगी वे ऐसी होंगी जो निर्धारित की जायें। (3) सेवा की शर्तें, वेतन सहित जो उप-धारा (2) के अन्तर्गत नियुक्त व्यक्तियों को दिया जायेगा ऐसा होगा जो निर्धारित किया जाए। (4) केन्द्रीय सरकार निर्देश दे सकती है कि एक सार्वमुद्रा या सार्वमुद्राएँ प्रपत्रों के प्रमाणीकरण (Authentication) के लिए बनाई जाये जो कम्पनी पंजीकरण के लिए आवश्यक या उससे सम्बन्धित है। कुछ प्रपत्रों की साक्ष्य के रूप में स्वीकार्यता (Admissibility of Certain Documents asEvidence) (धारा 397 ) – किसी अन्य कानून के बावजूद जो तत्समय (For the time being) लागू है, कोई भी प्रपत्र जो एक कम्पनी द्वारा कागज पर या ई-फार्म से फाइल की गई विवरणियों और प्रपत्रों से दुबारा तैयार किया गया है या व्युत्पन्न (Derived ) है या रजिस्ट्रार द्वारा या केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिकृत अन्य व्यक्ति द्वारा इलैक्ट्रोनिक आँकड़ों को भण्डार करने की युक्ति (Device) पर या कम्प्यूटर द्वारा पढ़ने योग्य माध्यम में भण्डार की गई हो और उसके द्वारा प्रमाणित किया गया है। ऐसे ढंग से जो निर्धारित हो, इस अधिनियम और इसके अन्तर्गत बनाए गए नियमों के उद्देश्यों के लिए और उसके अन्तर्गत चल रही किसी कार्यवाही में प्रपत्र माना जाएगा, बगैर किसी अतिरिक्त साक्ष्य या मूल-प्रपत्र की प्रस्तुती के, मूल प्रपत्र की विषय-सामग्री के या उसमें वर्णित किसी तथ्य के बारे में जिसका प्रत्यक्ष साक्ष्य स्वीकार्य है।

आवेदनों प्रपत्रों आदि को इलैक्ट्रोनिक रूप में दायर (Piling) करने और निरीक्षण करने के सम्बन्ध में प्रावधान (Provisions Relating to Filing of Applications, Documents and Inspection etc. in Electronic Form) (धारा 398) - इस अधिनियम में कुछ भी विपरीत होने के बावजूद और सूचना प्रौद्योगिक टैक्नोलॉजी अधिनियम, 2000 की धारा 6 के प्रावधानों के पूर्वाग्रह के बगैर, केन्द्रीय सरकार नियम बना सकती है ऐसी तिथि से जो नियमों में निर्दिष्ट हो। (a) ऐसे प्रार्थना-पत्र, स्थिति विवरण, प्रविवरण, विवरणी, घोषणा, सीमा पार्षद नियम, अन्तर्नियम, भार का विवरण या अन्य विवरण या प्रपत्र जिसका फाइल किया जाना या इस अधिनियम या इसके अन्तर्गत बनाए गए नियमों के अन्तर्गत इलैक्ट्रॉनिक प्रारूप में फाइल किये और प्रमाणित किये जा सके; ऐसे ढंग से जैसा निर्दिष्ट हो; दिया जाना या
(b) ऐसे प्रपत्र, सूचना, कोई संचार, सूचना जिसका इस अधिनियम के अन्तर्गत सुपुर्द करना और प्रमाणित करनाआवश्यक है इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप में ऐसे ढंग से जैसा निर्दिष्ट हो;

(e) ऐसे प्रार्थना पत्र स्थिति विवरण, प्रविवरण विवरणियाँ रजिस्टर, सीमा पार्षद नियम, अन्तर्नियम प्रभार का विवरण या अन्य विवरण या प्रपत्र और इस अधिनियम या इसके अन्तर्गत बनाये गये नियमों के अनुसार फाइल किये गये हैं, रजिस्ट्रार द्वारा इलैक्ट्रोनिक रूप में रखे (Maintain) जायेंगे और पंजीकृत या प्रमाणित किये जायेंगे, जैसी भी स्थिति हो, ऐसे ढंग से जैसा निर्दिष्ट हो;

(d) सीमानियम, अन्तर्नियम, रजिस्टर, अनुक्रमणिका, स्थिति विवरण, विवरणी या अन्य कोई विवरण या प्रपत्र जो इलैक्ट्रोनिक रूप में रखे गए हैं और अन्यथा जो निरीक्षण के लिए इस अधिनियम या इसके अन्तर्गत बनाये गये नियमों के अधीन, इलैक्ट्रोनिक प्रारूप में उपलब्ध हैं, किसी भी व्यक्ति द्वारा

उनका निरीक्षण इलैक्ट्रोनिक रूप में किया जा सकता है उस ढंग से जैसा निर्दिष्ट हो; (e) ऐसी फीस, प्रभार या इस अधिनियम या इसके अन्तर्गत बनाये गये नियमों के अधीन भुगतान की जाने वाली राशि का भुगतान इलैक्ट्रोनिक प्रारूप में ऐसे ढंग से किया जायेगा जैसा निर्दिष्ट हो;

(f) रजिस्ट्रार कार्यालय का परिवर्तन, सीमा पार्षद नियम या अन्तर्नियम, प्रविवरण में परिवर्तन का पंजीकरण करेगा, समामेलन का प्रमाण-पत्र, रजिस्टर, ऐसे प्रपत्रों का पंजीकरण करेगा, ऐसे प्रमाण-पत्र जारी करेगा, सूचना रिकॉर्ड करेगा, ऐसी सूचना या संचार प्राप्त करेगा जिसका इस अधिनियम या इसके नियमों के अन्तर्गत पंजीकरण जारी करना, रिकॉर्ड करना या प्राप्त करना आवश्यक है जैसी भी स्थिति हो, या कर्तव्य का पालन करना या कार्यों का निष्पादन करना या इस अधिनियम के अन्तर्गत या इसके अन्तर्गत बनाये गये नियमों के अधीन कोई कार्य करना जो इस अधिनियम के अन्तर्गत रजिस्ट्रार द्वारा निष्पादित या पूरा किया जाना है ऐसे ढंग से जो निर्दिष्ट हो ।।

स्पष्टीकरण (Explanation) — सन्देह को दूर करने के लिए यहाँ स्पष्ट किया जाता है (1) इस धारा के अन्तर्गत बनाये गये नियम, जुर्माना करने या अन्य आर्थिक दण्ड या माँग या फीस के भुगतान या इस अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन और उसके लिए दण्ड से सम्बन्धित नहीं है। (2) केन्द्र सरकार अधिसूचना जारी करके इलैक्ट्रोनिक प्रारूप में उप-धारा (1) के प्रावधानों के

कार्यान्वयन करने के लिए योजना बना सकती है।

रजिस्ट्रार द्वारा रखे गये प्रपत्रों का निरीक्षण, उनकी प्रस्तुति और साक्ष्य (Inspection, Production and Evidence of Documents Kept by Registrar) (धारा 399)

(1) इस तरह के क्रिया विशेषण में सक्रिय, कोई भी व्यक्ति

(a) इलैक्ट्रोनिक माध्यम से रजिस्ट्रार द्वारा नियमों के अनुसार रखे गये उन प्रपत्रों को जो उसके पास फाइल किये जाते हैं या पंजीकृत किये जाते हैं, इस अधिनियम के अनुसार या इस अधिनियम के अन्तर्गत किसी तथ्य का रिकॉर्ड रखना आवश्यक या रिकॉर्ड किया जाना अधिकृत है, का निरीक्षण, अग्रिम में निर्दिष्ट फीस देकर कर सकता है।
(b) किसी कम्पनी का समामेलन का प्रमाण-पत्र या अन्य किसी प्रपत्र का सारांश या किसी प्रपत्र का कोई भाग जिसे रजिस्ट्रार द्वारा प्रमाणित किया जाना है, अग्रिम में निर्दिष्ट फीस का भुगतान करके प्राप्त कर सकता है। बशर्ते कि इस उपधारा द्वारा प्रदान शक्तियों का प्रयोग किया जा सकेगा

(i) रजिस्ट्रार को धारा 26 में प्रविवरण के साथ सुपुर्द किये गये प्रपत्रों का निरीक्षण केवल प्रविवरण के प्रकाशित होने की तिथि से 14 दिनों के भीतर और अन्य समय केवल केन्द्र सरकार की आज्ञा से; और

(ii) धारा 388 की उप-धारा (1) के वाक्यांश (b) के अन्तर्गत सुपुर्द किये गये प्रपत्रों के सम्बन्ध में प्रविवरण की तिथि से आरम्भ होकर 14 दिनों के भीतर और किसी अन्य समय, केवल केन्द्र सरकार की आज्ञा से ।

(2) कोई भी न्यायालय या प्राधिकरण रजिस्ट्रार द्वारा रखे गये किसी प्रपत्र की प्रस्तुती के लिए रजिस्ट्रार को प्रक्रिया (आज्ञा) जारी नहीं करेगा सिवाय उस न्यायालय या प्राधिकरण की आज्ञा से और ऐसी प्रक्रिया यदि जारी की जाए तो उस पर यह वर्णित किया जायेगा कि यह न्यायालय या प्राधिकरण की आज्ञा से जारी किया गया है।

(3) इस अधिनियम के अन्तर्गत पंजीकरण के लिए किसी कार्यालय पर रखी और पंजीकृत किसी प्रपत्र की प्रतिलिपि या सारांश जो रजिस्ट्रार द्वारा सत्य प्रतिलिपि के रूप में प्रमाणित है (जिसकी अधिकारिक स्थिति (Whose Official Position) को सिद्ध करना आवश्यक नहीं होगा, सभी कानूनी कार्यवाहियों में साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य होगी मूल प्रपत्र की वैधता के समान।। इलैक्ट्रोनिक प्रारूप, अनन्य, वैकल्पिक या भौतिक प्रारूप के अतिरिक्त हो सकता है (Electronic form to be Exclusive, Alternative or in Addition to Physical form) (धारा 400 ) - केन्द्र सरकार धारा 398 और 399 के अन्तर्गत बनाये गये नियमों में प्रावधान कर सकती है कि इन धाराओं में निर्दिष्ट उद्देश्यों के लिए इलैक्ट्रॉनिक प्रारूप अनन्य, वैकल्पिक या भौतिक प्रारूप के अतिरिक्त हो सकता है। इलैक्ट्रोनिक प्रारूप के माध्यम से मूल्य वृद्धि सेवाओं का प्रावधान (Provision of Value Added Services Through Electronic Form (धारा 401 ) – केन्द्र सरकार ऐसी सेवा वृद्धि सेवाएँ (Value Added Services) प्रदान करे और उनके लिए ऐसी फीस निश्चित करे जैसी निर्दिष्ट हो। सूचना प्रौद्योगिक अधिनियम, 2000 के प्रावधानों का लागू होना (Application of Provisions of Information Technology Act, 2000) (धारा 402) – इलैक्ट्रोनिक रिकॉर्ड के सम्बन्ध में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के सभी प्रावधान उस ढंग और प्रारूप सहित जिसमें इलैक्ट्रोनिक रिकॉर्ड फाइल किये जाते हों जहाँ तक वे इस अधिनियम की विसंगति में नहीं हैं, धारा 398 में निर्दिष्ट इलैक्ट्रोनिक रिकॉर्ड सम्बन्ध में लागू होंगे। फाइलिंग के लिए फीस (Fees for Filing) (धारा 403) (1) कोई भी प्रपत्र, जिसका प्रस्तुतिकरण फाइल करना पंजीकरण, रिकॉर्ड करना या कोई तथ्य या सूचना जिसका पंजीकरण इस अधिनियम के अन्तर्गत आवश्यक है या अधिकृत है, प्रस्तुत, फाइल पंजीकरण या रिकॉर्ड उपर्युक्त प्रावधान में निर्दिष्ट समय के अन्दर ऐसी फीस के भुगतान के साथ किया जा सकता है जैसा निर्दिष्ट हो। बशर्ते कि कोई प्रपत्र, तथ्य या सूचना प्रस्तुत, फाइल, पंजीकृत या रिकॉर्ड सम्बन्धित प्रावधान में निर्दिष्ट समय के बाद प्रस्तुत, फाइल, उस तिथि के 270 दिनों में पंजीकृत या रिकॉर्ड की जा सकती है। जिस तिथि को इसे प्रस्तुत, फाइल, पंजीकृत या रिकॉर्ड किया जाना था फीस के भुगतान के साथ जो निर्धारित हो इस धारा के अन्तर्गत ।

(2) जहाँ एक कम्पनी उप-धारा (1) के अन्तर्गत प्रपत्र प्रस्तुत, फाइल पंजीकरण या रिकॉर्ड करने मे असफल रहती है या कोई गलती करती है इस उप-धारा के प्रथम परतुंक (Provison) में निर्दिष्ट अवधि में अतिरिक्त फीस के साथ, कम्पनी और प्रत्येक दोषी अधिकारी, फीस और अतिरिक्त फीस के भुगतान के दायित्व के पूर्वाग्रह के बगैर ऐसी असफलता या चूक के लिए इस अधिनियम में निर्दिष्ट जुमान या सजा पाने के अधिकारी हैं। फीस आदि का सार्वजनिक खाते में जमा करना (Fees etc. to be Credited into Public Account (धारा 404) - सभी फीस, में प्रभार या अन्य राशि जो रजिस्ट्रार, अतिरिक्त रजिस्ट्रार या सहायक रजिस्ट्रार द्वारा या केन्द्र सरकार के किसी अन्य अधिकारी द्वारा इस अधिनियम के प्रावधानों के अन्तर्गत प्राप्त की गई हो, रिजर्व बैंक में भारत के सार्वजनिक खाते में जमा की जायेगी।





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